Sunday, September 25, 2022

केरल हाई कोर्ट ने बंद को लेकर PFI नेताओं के खिलाफ स्वत: संज्ञान लिया


23 सितंबर, 2022र

केरल उच्च न्यायालय ने आज दक्षिणी राज्य के भीतर आज हड़ताल की घोषणा को लेकर भारत के कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन (पीएफआई) और उसके राज्य महासचिव के खिलाफ स्वत: संज्ञान लिया।

न्यायमूर्ति एके जयशंकरन नांबियार ने कहा कि 2019 के अपने आदेश के बावजूद, पीएफआई ने कल अचानक रोक लगा दी।

अदालत ने कहा, "हमारे पहले के आदेश में सोची गई प्रक्रिया का पालन किए बिना उपरोक्त व्यक्तियों की हड़ताल का आह्वान करना, स्पष्ट रूप से, उपरोक्त आदेश के भीतर इस अदालत के निर्देशों की अवमानना ​​के समान है।"

अदालत ने स्वत: संज्ञान लेते हुए पुलिस को निर्देश जारी किया कि हड़ताल के फैसले का समर्थन नहीं करने वालों की सार्वजनिक और निजी संपत्ति को किसी भी तरह की क्षति या क्षति को रोकने के लिए पर्याप्त उपायों की पुष्टि की जाए।

"विशेष रूप से, पुलिस अवैध हड़ताल के समर्थकों द्वारा इस तरह की किसी भी गतिविधि को देखने के लिए भी कदम उठाएगी और इस तरह के उदाहरणों का विवरण देने वाली एक रिपोर्ट इस अदालत के सामने रखेगी और इसलिए सार्वजनिक / निजी को नुकसान की सीमा, यदि कोई हो।  संपत्ति। उक्त विवरण इस अदालत के लिए आवश्यक होगा ताकि अवैधता के अपराधियों से इस तरह के नुकसान की वसूली के लिए उपचारात्मक कार्रवाई की आवश्यकता हो, "न्यायमूर्ति नांबियार ने कहा।

अदालत ने पुलिस से किसी भी या सभी सार्वजनिक-सेवा निगम सेवाओं को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करने के लिए कहा, जो अवैध हड़ताल का समर्थन करने वालों के हाथों हिंसा की आशंका जताते हैं।

राज्य के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी नोट किया कि मीडिया घराने "फ्लैश हड़ताल" की खबरों को रिपोर्ट कर रहे थे, आदेश के छोटे प्रिंट का उल्लेख किए बिना अदालत ने सात दिनों के सार्वजनिक नोटिस के बिना इसे अवैध घोषित कर दिया।

"इसलिए, हम एक बार फिर मीडिया से यह पुष्टि करने के लिए अनुरोध करना आवश्यक समझते हैं कि जब भी इस तरह की अवैध फ्लैश हड़ताल का संबंध है, और यह स्पष्ट है कि उक्त हड़ताल इस अदालत के आदेशों का उल्लंघन है, तो आम जनता को विधिवत सूचित किया जाए।  उक्त तथ्य, “अदालत ने कहा।

इसमें कहा गया है कि हड़ताल के निर्णय की वैधता के संबंध में अंतिम जनता की आशंकाओं को दूर करने के लिए और सार्वजनिक सेवा निगम सेवाओं के प्रदाताओं को भविष्य में इस तरह की अवैध हड़तालों पर ध्यान देने से रोकने के लिए यह काफी हद तक पर्याप्त होगा।

अदालत ने अब मामले को 29 सितंबर को सरकार की रिपोर्ट के लिए पोस्ट किया है।

एचसी ने 7 जनवरी, 2019 को यह मजबूत किया कि फ्लैश हड़ताल, यानी उन हड़तालों / हड़तालों को 7 दिनों की सार्वजनिक सूचना देने की प्रक्रिया पर जोर दिए बिना, अवैध / असंवैधानिक माना जाएगा, जो हड़ताल के लिए बुलाने वाले व्यक्तियों / पार्टी के लिए प्रतिकूल परिस्थितियों में शामिल होंगे।

Monday, September 12, 2022

ज्ञानवापी मामले पर बड़ा अपडेट: वाराणसी कोर्ट ने मुस्लिम पक्षों की याचिका खारिज की- महिला उपासकों द्वारा दायर वाद चलेगा

सोमवार को वाराणसी जिला अदालत, जिसने काशी विश्वनाथ-ज्ञानवापी मस्जिद के परिसर के भीतर स्थित श्रृंगार गौरी मंदिर में दैनिक पूजा की अनुमति मांगने वाली याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था, ने फैसला सुनाया कि 5 हिंदू महिलाओं द्वारा दायर मुकदमा ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में धार्मिक अनुष्ठान सुनवाई योग्य है।

वाद की मेरिट पर बहस 22 सितंबर से शुरू होगी।

अदालत ने अंजुमन समिति द्वारा मुकदमे की पोषणीयता को चुनौती देने वाली आदेश 7 नियम 11 सीपीसी की याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि हिंदू उपासकों द्वारा दायर मुकदमा विचारणीय है।

यह माना गया है कि मामला पूजा स्थल अधिनियम या वक्फ अधिनियम द्वारा वर्जित नहीं है।

24 अगस्त को, जिला न्यायाधीश अजय कृष्ण विश्वेश ने श्रृंगार गौरी मंदिर में पूजा के अधिकार की मांग करने वाली पांच महिलाओं द्वारा दायर एक याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

याचिका पर अदालत ने पहले मस्जिद के मैदान की वीडियोग्राफी और सर्वेक्षण का आदेश दिया था। वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर से सटे ज्ञानवापी मस्जिद के अंदर किए गए वीडियोग्राफी सर्वेक्षण की रिपोर्ट जिला अदालत को पहले ही मिल चुकी थी।

हिंदू याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने पहले दावा किया था कि एक छोटे से तालाब में एक ‘शिवलिंग’ खोजा गया था, जिसके बाद अदालत ने आदेश दिया कि क्षेत्र को सील कर दिया जाए।

दूसरी ओर, मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों ने इस दावे का खंडन करते हुए दावा किया कि ‘शिवलिंग’ वास्तव में एक ‘फव्वारा’ था। उन्होंने यह भी दावा किया कि वाराणसी की अदालत ने स्थान सील करने का आदेश जारी करने से पहले मुस्लिम वकीलों की बात नहीं सुनी।

याचिका की सुनवाई के दौरान, हिंदू याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने दावा किया कि मुगल सम्राट औरंगजेब ने 17 वीं शताब्दी में मंदिर के एक हिस्से को ध्वस्त कर दिया था।

मुस्लिम पक्ष ने दावा किया कि मस्जिद औरंगजेब के शासनकाल से पहले मौजूद थी और इसका उल्लेख भूमि अभिलेखों में भी किया गया था।

परिसर दशकों से दोनों समुदायों के बीच विवाद का एक स्रोत रहा है, लेकिन राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट के अनुकूल फैसले के बाद काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर को “पुनर्प्राप्त” करने के लिए हिन्दू संगठनों द्वारा एक नए सिरे से जोर दिया गया था।

Monday, September 5, 2022

आर्य समाज मंदिर के विवाह प्रमाण पत्र से ही विवाह साबित नहीं होता: इलाहाबाद हाईकोर्ट


न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की पीठ ने कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण एक विशेषाधिकार प्राप्त रिट है और एक असाधारण उपाय है। इसे एक अधिकार के रूप में जारी नहीं किया जा सकता है, केवल उचित आधार पर या संभावना दिखाई जाती है, तो हाई जारी किया जा सकता है।”

इस मामले में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर आरोप लगाया गया है कि कॉर्पस याचिकाकर्ता नंबर 1 की पत्नी है। यह साबित करने के लिए कि वे कानूनी रूप से विवाहित थे, याचिकाकर्ताओं के वकील श्री धर्म वीर सिंह ने आर्य समाज मंदिर, गाजियाबाद द्वारा जारी एक प्रमाण पत्र और विवाह के पंजीकरण के प्रमाण पत्र के साथ-साथ कुछ तस्वीरों पर भरोसा किया है।

पीठ ने कहा कि “अदालत में विभिन्न आर्य समाज समितियों द्वारा जारी किए गए विवाह प्रमाणपत्रों की बाढ़ आ गई है, जिन पर इस अदालत के साथ-साथ अन्य उच्च न्यायालयों के समक्ष विभिन्न कार्यवाही के दौरान गंभीरता से पूछताछ की गई है। उक्त संस्था ने दस्तावेजों की वास्तविकता पर विचार किए बिना विवाह आयोजित करने में अपने विश्वास का दुरुपयोग किया है और चूंकि विवाह पंजीकृत नहीं किया गया है, इसलिए केवल उक्त प्रमाण पत्र के आधार पर यह नहीं माना जा सकता है कि पार्टियों ने शादी कर ली है।

उच्च न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के पास आपराधिक और नागरिक कानून के तहत इस उद्देश्य के लिए अन्य उपाय उपलब्ध हैं, इसलिए, पति के कहने पर बंदी प्रत्यक्षीकरण के लिए वर्तमान रिट याचिका अपनी पत्नी को वापस पाने के लिए क्योंकि कॉर्पस निश्चित रूप से बनाए रखने योग्य नहीं है, इस बात की अनदेखी करते हुए कि विवाह को अनुष्ठापित नहीं माना जा सकता।

उपरोक्त को देखते हुए पीठ ने याचिका खारिज कर दी।

केस शीर्षक: भोला सिंह और एक अन्य बनाम यू.पी. राज्य। और 5 अन्य

बेंच: जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी

Merely because the complainant and eye-witness did not support the prosecution version- compensation can not be denied.


Motor Vehicles Act, 1988 Section 173 Fatal accident case - Appeal by Insurance Company - Merely because the complainant and eye-witness did not support the prosecution version, would not mean that the claimants are not entitled for compensation - Rs.40,000/- for loss of consortium and Rs.15,000/- for funeral expenses added - Therefore impugned amount of compensation of Rs.9,02,800/- upheld - Appeal dismissed.

Sunday, September 4, 2022

निजी स्कूल के शिक्षक भी होंगे ग्रेच्युटी के हकदार-सुप्रीम कोर्ट

निजी स्कूल के शिक्षक भी होंगे ग्रेच्युटी के हकदार, सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला।

न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी की पीठ ने कहा कि "संशोधन समानता लाने और शिक्षकों के साथ उचित व्यवहार करने का प्रयास करता है।  इसे शायद ही एक मनमाना और उच्चस्तरीय अभ्यास के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।"
पीएजी अधिनियम 16 सितंबर, 1972 से लागू है। इसका लाभ उन कर्मचारियों को मिलता है जिसने अपनी सेवानिवृत्ति, इस्तीफे या किसी भी कारण से संस्थान छोड़ने से पहले वहां कम से कम 5 साल तक निरंतर नौकरी की है।

प्राइवेट स्कूलों के शिक्षकों के लिए अच्छी खबर (Good news for teachers of private schools)आई है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट(Supreme Court) ने सभी प्राइवेट स्कूलों को निर्देश दिया है कि वे शिक्षकों को छह सप्ताह के भीतर 3 अप्रैल 1997 से पहले की सेवा के लिए ब्याज सहित ग्रेच्युटी का भुगतान करें। इस मामले में मंगलवार, 30 अगस्त को आए फैसले में अदालत ने कर्मचारी के दायरे में शिक्षकों सहित ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम, 1972 में संसद के संशोधन की वैधता को सही ठहराया और निजी स्कूलों के लिए पात्र लोगों को ग्रेच्युटी का भुगतान करना अनिवार्य (It is mandatory for private schools to pay gratuity to eligible people)कर दिया है।

अहमदाबाद निजी प्राथमिक शिक्षक संघ से संबंधित मामले में सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस संजीव खन्ना की अगुवाई वाली पीठ ने कानून संबंधी दोष का हवाला देते हुए यह आदेश दिया। पीठ ने निजी स्कूलों को छह सप्ताह में अधिनियम के तहत कर्मचारियों/ शिक्षकों को ब्याज सहित ग्रेच्युटी का भुगतान करने का आदेश जारी किया है। बता दें कि इंडिपेंडेंट स्कूल्स फेडरेशन ऑफ इंडिया की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश आया है।
निजी स्कूलों और उनसे जुड़ी संस्थाओं से संशोधन की चुनौती को खारिज करते हुए न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी की पीठ ने कहा कि कर्मचारी के लिए ग्रेच्युटी उसके द्वारा दी जा रही सेवाओं की न्यूनतम शर्तों में से एक है। बता दें कि इससे पहले कुछ निजी स्कूलों का दावा था कि पीएजी अधिनियम की धारा 2 (ई) में के तहत शैक्षणिक संस्थानों या स्कूलों में जो शिक्षक कार्य कर रहे हैं वो कर्मचारी की श्रेणी में नहीं आते हैं। अदालत ने इस दावे को खारिज कर दिया है।

अदालत ने कहा कि कर्मचारी/शिक्षक पीएजी अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार अपना भुगतान पाने के लिए अपने सही फोरम का इस्तेमाल कर सकते हैं। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने 2004 के फैसले में बताए गए संशोधन को लाने और दोष को दूर करने के लिए विधायी अधिनियम को बरकरार रखा।

सर्वोच्च अदालत ने कहा कि निजी स्कूलों का यह कहना कि उनकी क्षमता ग्रेच्युटी देने की नहीं है, तो यह अनुचित है। पीएजी अधिनियम सहित अन्य कानूनों का पालन करने के लिए सभी प्रतिष्ठान बाध्य हैं।

बता दें कि इससे पहले प्राइवेट स्कूलों ने ग्रेच्युटी न देने को लेकर कई उच्च न्यायालयों में अपील की थी। उन्हें दिल्ली, पंजाब और हरियाणा, इलाहाबाद, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बॉम्बे और गुजरात हाईकोर्ट से भी कोई राहत नहीं मिली। इसके बाद स्कूलों द्वारा सुप्रीम कोर्ट में इसको लेकर अलग से चुनौती दी गई थी। जहां उन्हें निराशा ही हाथ लगी है।

5 साल नौकरी के बाद..

पीएजी अधिनियम 16 सितंबर, 1972 से लागू है। इसका लाभ उन कर्मचारियों को मिलता है जिसने अपनी सेवानिवृत्ति, इस्तीफे या किसी भी कारण से संस्थान छोड़ने से पहले वहां कम से कम 5 साल तक निरंतर नौकरी की है। 3 अप्रैल, 1997 को श्रम और रोजगार मंत्रालय द्वारा जारी एक अधिसूचना के जरिए इस अधिनियम को दस या उससे अधिक कर्मचारियों वाले शैक्षणिक संस्थानों पर भी अमल में लाया गया था। ऐसे में ये अधिनियम निजी स्कूलों पर भी लागू होते हैं।

केस टाइटल - इंडिपेंडेंट स्कूल फेडरेशन आफ इंडिया एवं अन्य बनाम भारत संघ आदि
सिविल अपील सं० - 8162/2012

रिपोर्ट: अरुण कुमार गुप्त अधिवक्ता उच्च न्यायालय प्रयागराज

Wednesday, August 31, 2022

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने OBC की 18 जातियों को SC कैटेगरी में शामिल करने के नोटिफिकेशन को रद्द कर दिया है ।

समाजवादी पार्टी और योगी सरकार के शासन काल के दौरान इन 18 जातियों को ओबीसी से हटाकर एससी में शामिल करने का नोटिफिकेशन जारी हुआ था। हाईकोर्ट ने 24 जनवरी 2017 को इन जातियों को सर्टिफिकेट जारी करने पर रोक लगाई थी। इन जातियों में मझवार, कहार, कश्यप, केवट, मल्लाह, निषाद, कुम्हार, प्रजापति, धीवर, बिंद, भर,राजभर, धीमान, बाथम,तुरहा गोडिया, मांझी और मछुआ जातियां शामिल हैं। दरअसल याचिकाकर्ता ने कोर्ट में दलील दी थी कि किसी जाति को एससी, एसटी या ओबीसी में शामिल करने का अधिकार सिर्फ देश की संसद को है। 

 उक्त आदेश चीफ जस्टिस राजेश बिन्दल और जे. जे. मुनीर की बेंच ने  2016 और 2019 के नोटिफिकेशन को चुनौती देने वाली डा. बी. आर. अम्बेडकर ग्रन्थालय एवं जन कल्याण और अन्य की पी.आई.एल. को स्वीकार करते हुए पारित किया! 

जानकारी के मुताबिक अखिलेश सरकार ने अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों में 22 दिसंबर 2016 को नोटिफिकेशन जारी कर 18 जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल किए जाने का नोटिफिकेशन जारी किया था। अखिलेश सरकार की तरफ से जिले के सभी डीएम को आदेश जारी किया गया था कि इस जाति के सभी लोगों को ओबीसी की बजाय एससी का सर्टिफिकेट दिया जाए।

बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने 24 जनवरी 2017 को इस नोटिफिकेशन पर रोक लगा दी थी। 24 जून 2019 को यूपी की योगी सरकार ने एक बार फिर से नया नोटिफिकेशन जारी किया इन जातियों को ओबीसी से हटाकर एससी कैटेगिरी में डालने का नोटिफिकेशन जारी किया था।  हाई कोर्ट में याचिकाकर्ता की तरफ से दलील दी गई थी कि अनुसूचित जातियों की सूची भारत के राष्ट्रपति द्वारा तैयार की गई थी। इसमें किसी तरह के बदलाव का अधिकार सिर्फ देश की संसद को है। राज्यों को इसमें किसी तरह का संशोधन करने का कोई अधिकार नहीं है।
रिपोर्ट: अरुण कुमार गुप्त अधिवक्ता उच्च न्यायालय प्रयागराज

Thursday, August 25, 2022

हस्तलेख विधि पर बिशेष जानकारी प्रदान करने हेतु व्याख्यान कार्यक्रम का आयोजन

दिनांक 27 अगस्त 2022 को समय 6:30 बजे से अधिवक्ता परिषद उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड द्वारा हस्त लेखविधि पर व्याख्यान अर्थात स्वाध्याय मंडल का आयोजन किया जा रहा है। इस कार्यक्रम से जुड़ने के लिए अधिवक्ता परिषद उत्तर प्रदेश उत्तराखंड के ट्विटर हैंडल फेसबुक पेज एवं यूट्यूब चैनल से जुड़ा जा सकता है।
इस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता श्रीमान अभिषेक वशिष्ट जी होंगे जो कि एक जाने-माने हस्त रेखा विशेषज्ञ एवं फॉरेंसिक एक्सपर्ट हैं।



यौन इरादे से बच्चे के निजी अंगों को छूना POCSO एक्ट की धारा 7 के तहत यौन उत्पीड़न के रूप में माना जाने के लिए पर्याप्त है- बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि केवल यौन इरादे से बच्चे के निजी अंगों को छूना POCSO एक्ट (The Protection of Children from Sexual Offences Act) की धारा 7 के तहत यौन उत्पीड़न के रूप में माना जाने के लिए पर्याप्त है। इसके साथ ही चोट का प्रदर्शन करने वाला मेडिकल सर्टिफिकेट अनिवार्य नहीं है।

कोर्ट ने कहा,

"मेडिकल सर्टिफिकेट में उल्लिखित चोट की अनुपस्थिति से उसके मामले में कोई फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि POCSO एक्ट की धारा 7 के तहत परिभाषित यौन उत्पीड़न के अपराध की प्रकृति में POCSO एक्ट की धारा 8 के साथ पठित धारा 7 के प्रावधान में उल्लेख है कि यौन इरादे से निजी अंग को छूना भी आकर्षित करने के लिए पर्याप्त है।"

जस्टिस सारंग कोतवाल ने 2013 में नाबालिग लड़की के यौन उत्पीड़न के लिए दोषी ठहराए गए व्यक्ति की अपील खारिज कर दी। नवंबर, 2017 में उसे भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा धारा 354 और PCOSO एक्ट की धारा 8 के तहत दोषी ठहराया गया था और उसे पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी।
पीड़ित पक्ष का मामला यह है कि जब वह घर के बाहर अपने दोस्तों के साथ खेल रही थी तो उस व्यक्ति ने लड़की को उठा लिया और उसके गुप्तांगों को छुआ और चुटकी ली। मां के पुलिस से संपर्क करने के बाद शिकायत दर्ज कराई गई।

पीड़िता का बयान सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दर्ज किया गया।
आरोपी ने कहा कि लड़की के पिता ने झगड़े के बाद उसे झूठा फंसाया और एफआईआर दर्ज करने में दो दिन की देरी हुई। उसने तर्क दिया कि मामला इसलिए भी संदिग्ध है, क्योंकि पीड़ित के शरीर पर कोई चोट नहीं है।
हालांकि, पीठ ने कहा,

"पीड़ित ने घटना का पर्याप्त विस्तार से वर्णन किया। पीड़ित गवाही सच्ची प्रतीत होती है। पीड़ित द्वारा अपीलकर्ता की गलत पहचान करने की कोई संभावना नहीं है।"

इसके अलावा, POCSO एक्ट की धारा 7 के तहत वर्णित यौन उत्पीड़न को मेडिकल साक्ष्य के रूप में चोटों की अनुपस्थिति में भी यौन इरादे को साबित करने के रूप में बनाया गया।
कोर्ट ने कहा,

"इस मामले में पीड़िता और उसकी मां का आंखों देखा विवरण आत्मविश्वास को प्रेरित करता हैं और उनके वर्जन पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है। अपीलकर्ता का बचाव वास्तव में उसके कारण की मदद नहीं करता। इस प्रकार, इन सभी पहलुओं पर विचार करते हुए हस्तक्षेप का कोई मामला नहीं है। आक्षेपित निर्णय और आदेश किया जाता है और अपील खारिज की जाती है।"

केस टाइटल: रामचंद्र श्रीमंत भंडारे बनाम महाराष्ट्र राज्य

रिपोर्ट: अरुण कुमार गुप्त अधिवक्ता उच्च न्यायालय प्रयागराज

Tuesday, August 23, 2022

पॉक्सो एवं एस. सी एस.टी.एक्ट के अंतर्गत अभियुक्त को आजीवन कारावास की सज़ा

श्रीमान विशेष न्यायाधीश पॉक्सो एक्ट जनपद सम्भल स्थान चंदौसी श्री अशोक कुमार यादव के न्यायालय से अभियुक्त अर्जुन पुत्र कृपाली निवासी ग्राम फिरोजपुर थाना नखासा जिला सम्भल  को विशेष सत्र परीक्षण संख्या -04/2021, अपराध संख्या -538/2020, अंतर्गत धारा -366,376 IPC एवं 3/4 पॉक्सो एक्ट एवम  3(2)SC ST ACT थाना -कोतवाली नखासा, जिला सम्भल। में अभियुक्त द्वारा नाबालिग पीड़िता को हिमाचल प्रदेश में ले जाकर  लगातार बलात्कार किया गया। जिसके परिणाम स्वरूप आज माननीय न्यायालय द्वारा अभियुक्त को आजीवन कारावास का कठोर कारावास एवं 20,000 हजार रूपये का जुर्माना से दंडित किया गया।
23-08-2022

Sunday, August 21, 2022

तलाक़-ए-हसन क्या है?


सुप्रीम कोर्ट ने एक मुस्लिम महिला बेनज़ीर की याचिका की सुनवाई के दौरान ये कहा कि इस्लाम में 'तलाक़-ए-हसन' उतना अनुचित भी नहीं है.

क्या है मामला? 

बेनज़ीर हिना की वकील सुदामिनी शर्मा ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि उनकी मुवक्किल का आठ माह का बच्चा है और बेनज़ीर के पति ने किसी अधिवक्ता के ज़रिए तीन बार लिखित रूप में तलाक़ भेजा है और कहा है कि 'तलाक़-ए-हसन' के तहत उन्होंने ऐसा किया.

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 'ट्रिपल तलाक़' या एक साथ तीन बार तलाक़ कहने से शादी ख़त्म होने को ग़लत करार दिया था. संयोग से सुप्रीम कोर्ट का ये फ़ैसला भी वर्ष 2017 के अगस्त महीने में ही आया था.

अब बेनज़ीर ने 'तलाक़-ए-हसन' को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. उन्होंने अपनी याचिका में कहा है कि "अदालत इस प्रक्रिया को 'एकतरफ़ा, असंवैधानिक' क़रार दे क्योंकि ये 'संविधान के अनुछेद 14, 15, 21 और 25 का उल्लंघन है."

हालांकि सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति एम एम सुन्दरेश की खंडपीठ ने कहा कि "तलाक़-ए-हसना 'उतना अनुचित भी नहीं है." ये टिप्पणी न्यायमूर्ति संजय किशन कौल ने फ़ैसला लिखते समय मौखिक रूप से की. 

उन्होंने टिप्पणी करते हुए ये भी कहा कि ''तलाक़-ए-हसन' उतना अनुचित भी नहीं है हम नहीं चाहते कि इस मामले को कोई एजेंडे के रूप में इस्तेमाल करे."

उनका कहना था कि वो आवेदनकर्ता बेनज़ीर के वकील की दलील से सहमत नहीं हैं. दो सदस्यों वाली खंडपीठ की अध्यक्षता कर रहे न्यायमूर्ति कौल ने ये भी कहा कि मुस्लिम महिलाओं को भी 'ख़ुला के तहत तलाक़' मांगने की स्वतंत्रता' है. यानी मुस्लिम महिला ख़ुद से भी तलाक़ ले सकती है.

तलाक़ सबसे बुरा काम"

सुदामिनी शर्मा ने कहा कि बेनज़ीर के पति यूसुफ़ नकी ने तलाक़ के लिए नहीं लिखा बल्कि अपने वकील के ज़रिए ही तीन बार तलाक़ की चिट्ठियां भिजवाईं. बेनज़ीर ने इस प्रक्रिया के संवैधानिक औचित्य पर सवाल उठाते हुए इस पर प्रतिबन्ध लगाने की मांग की है.

इस बीच बेनज़ीर को उनके पति ने 'मेहर' के 15,000 रुपये दिए जो उन्होंने वापस लौटा दिए.

अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई अगस्त की 28 तारीख़ को रखी है.

जाने-माने इस्लामिक मामलों के जानकार और आलिम मौलाना राशिद ने सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का स्वागत किया, मगर उन्होंने बेनज़ीर के पति यूसुफ़ नकी ने जिस तरह तलाक़ दिया है उसपर आपत्ति जताई है. उनका कहना है कि पूरे मामले में मध्यस्ता करने की कोशिश भी नहीं की गई जो ग़लत है.
मौलाना राशिद जिन्होंने इस्लामी धार्मिक किताबें लिखी हैं कहते हैं, "अल्लाह के लिए सबसे बुरा काम कोई है तो वो है दो जीवन साथियों का तलाक़ लेना."

इसलिए उनका कहना है कि समाज के लोगों को बीच में मध्यस्थता करनी ही चाहिए. इस पर शरियत और इस्लामी तौर तरीक़ों की जानकारी रखने वाले आलिम या विद्वान कहते हैं कि शरियत में इस प्रक्रिया को स्पष्ट तरीक़े से बताया भी गया है.
हसन का मतलब 'बेहतर'
मौलाना राशिद कहते हैं, "तलाक़-ए-हसन की प्रक्रिया लंबी है. हसना का मतलब 'बेहतर' होता है इसलिए ये बेहतर तरीक़ा है."

मुस्लिम उलेमा कहते हैं कि सिर्फ़ तलाक़ बोलना ही काफ़ी नहीं है. वो कहते हैं कि ''पहली बार तलाक़ बोलने के बाद दंपति के बिस्तर भी अलग हो जाने चाहिए और दोनों के बीच कोई रिश्ता नहीं होना चाहिए. ऐसा महिला की तीन माहवारियों तक होना चाहिए.''

कांधला के रहने वाले मौलाना राशिद के अनुसार, शरियत में तलाक़ को ही ग़लत माना गया है.

उनका कहना है, ''तलाक़-ए-हसन के तहत पहली बार तलाक़ बोलने के बाद दंपति के बीच विवाद को ख़त्म करने की प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिए - या तो पंचायत के माध्यम से हो या फिर दोनों के परिवारों के लोगों का ये प्रयास करना चाहिए.

दूसरी बार भी तलाक़ बोलते वक़्त गवाह भी मौजूद रहने चाहिए और मध्यस्ता की प्रक्रिया भी होनी चाहिए. इतने प्रयासों के बाद भी अगर दोनों के बीच ऐसे हालात पैदा हो जाते हैं कि तलाक़ का ही एक रास्ता बचता है, उस स्थिति में तीसरी माहवारी के बाद ही तलाक़ हो जाता है. वो भी जब सारे प्रयास ख़त्म हो जाएँ. इसमें पत्नी की सहमति भी ज़रूरी है.''
इस्लामी क़ानून के कुछ अन्य विद्वानों का मानना है कि इस बीच दंपति अगर एक साथ रहे और एक साथ एक ही बिस्तर पर सोते भी रहे तो ऐसी सूरत में ये तलाक़ मान्य ही नहीं होगा. उनका तर्क है कि अलग-अलग रहने पर ही पति और पत्नी को ये एहसास होगा कि उनमें क्या-क्या कमियां हैं और क्या वो एक-दूसरे से अलग होकर रह पाएंगे?
महिलाओं को भी तलाक़ देने का अधिकार
लेकिन पत्रकार रह चुकी बेनज़ीर ने अपनी याचिका में तर्क दिया कि उनके साथ जो हुआ वो एकतरफ़ा क़दम था जबकि महिला को भी अधिकार होना चाहिए ये फ़ैसला करने का कि वो भी तलाक़ चाहती है या नहीं.

सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति कॉल ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि मुस्लिम महिला को भी 'ख़ुला' यानी तलाक़ देने का अधिकार है. हालांकि मुस्लिम उलेमा कहते हैं कि ख़ुला लेने की सूरत में महिला को शादी के समय तय की गई 'मेहर' की रक़म नहीं मिलेगी.

मुस्लिम उलेमाओं के बीच इसको लेकर बहस भी चल रही है क्योंकि अलग-अलग 'फ़िरक़े' या पंथ अलग-अलग सामाजिक रीतियों के हिसाब से चलते हैं. उनका कहना है कि बरेलवी मुसलमान शरीयत और हदीस की व्याख्या अपने हिसाब से करते हैं तो देवबंदी और सलफ़ी मुसलमान अपने हिसाब से.

अदालतों में जब मामले पहुँचते हैं तो धार्मिक स्वतंत्रता की वजह से अदालतें इन मुद्दों को समाज पर ही छोड़ना बेहतर समझती हैं. ऐसा बेनज़ीर के मामले में भी हुआ है.
प्रस्तुतकर्ता 
अरुण कुमार गुप्त अधिवक्ता
 उच्च न्यायालय प्रयागराज
मो. नं - 9450680169

हस्तलेख परीक्षण के लिये मूल दस्तावेज आवश्यक - इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला देते हुए कहा दस्तावेज़ की केवल फोटो-कॉपी होने पर हस्ताक्षरों की फोरेंसिक अथवा हस्तलेखन विशेष...