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Monday, July 6, 2026
मोरमुगाओ पोर्ट से शिवाजी की प्रतिमा हटाने के बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया
Tuesday, February 3, 2026
निजी संपत्ति में धार्मिक आयोजन को अनुमति की आवश्यकता नहीं
Monday, February 2, 2026
नेशनल चर्च काउंसिल ने 12 राज्यो के मतांतरण कानून के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की
नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेज़ ऑफ इंडिया ने सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की है, जिसमें बारह राज्यों - ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, हरियाणा और राजस्थान - द्वारा बनाए गए धर्मांतरण विरोधी कानूनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने इस मामले को धार्मिक धर्मांतरण कानूनों से संबंधित अन्य समान याचिकाओं के साथ जोड़ दिया है। इन याचिकाओं पर तीन जजों की बेंच सुनवाई करेगी
Tuesday, October 22, 2024
उत्तर प्रदेश मदरसा एक्ट रद्द करने के मामले में सुनवाई पूरी, राज्य सरकार ने कहा- नहीं रद्द होना चाहिए पूरा कानून
उत्तर प्रदेश सरकार ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि उत्तर प्रदेश मदरसा एक्ट रद्द करने का हाई कोर्ट का फैसला राज्य सरकार ने स्वीकार कर लिया है और फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती नहीं दी है।
जब शीर्ष अदालत ने कानून के समर्थन को लेकर सवाल पूछा और कहा कि प्रदेश सरकार ने हाई कोर्ट में कानून का समर्थन किया था? क्या यहां भी वह समर्थन करती है, क्योंकि कानून राज्य सरकार का है?
इस पर एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने कहा कि वह उस पर कायम हैं। उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट को पूरा कानून रद्द नहीं करना चाहिए था, सिर्फ मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाले प्रावधानों को ही रद्द किया जाना चाहिए था। प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने मंगलवार को सभी पक्षों की बहस सुनकर मामले पर फैसला सुरक्षित रख लिया।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गत 22 मार्च को उत्तर प्रदेश मदरसा एक्ट 2004 को असंवैधानिक ठहरा दिया था। कोर्ट ने इस कानून को धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का उल्लंघन माना था और मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों को नियमित स्कूलों में स्थानांतरित करने का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश पर पहले ही अंतरिम रोक लगा दी थी।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने मदरसों के पाठ्यक्रम में मुख्य विषयों को पढ़ाए जाने और वहां पढ़ने वाले बच्चों को भी मुख्यधारा में शामिल होने योग्य बनाने की बात कही। सीजेआई ने पूछा क्या मदरसे का छात्र नीट की परीक्षा में शामिल हो सकता है। नटराज ने कहा कि उसके लिए पीसीएम चाहिए होता है।
कोर्ट ने कहा कि सरकार के पास रेगुलेट करने का व्यापक अधिकार है। कानून सिर्फ रेगुलेशन के लिए था। मदरसों की पढ़ाई का विरोध कर रहे और वहां दी जाने वाली धार्मिक शिक्षा को बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए पर्याप्त न होने की दलीलों पर कोर्ट ने कहा कि धार्मिक शिक्षा सिर्फ मुस्लिम समुदाय तक सीमित नहीं है, अन्य धर्मों में भी यही नियम हैं।
चीफ जस्टिस ने कहा कि हमारा देश विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों का मिश्रण है, हमें इसे संरक्षित करना चाहिए। कोर्ट ने मदरसों, वैदिक पाठशालाओं और बौद्ध भिक्षुओं का उदाहरण देते हुए कहा भारत में धार्मिक शिक्षा के कई रूप हैं। चिकित्सा में भी कई शाखाएं हैं जिनकी उत्पत्ति अलग अलग है। जैसे आयुर्वेद, सिद्धा, यूनानी आदि, अगर संसद इन्हें रेगुलेट करने के लिए कानून लाती है तो उसमें क्या गलत है।
पीठ ने मदरसा की शिक्षा को नाकाफी बता रही राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) की वकील से भी कई सवाल पूछे। पूछा कि एनसीपीसीआर ने सिर्फ एक ही समुदाय के मदरसों के बच्चों को नियमित स्कूलों में भेजने का निर्देश दिया है या फिर धार्मिक शिक्षा देने वाली अन्य संस्थाओं को भी ऐसे निर्देश जारी किये हैं।
एनसीपीसीआर की वकील ने कहा कि आयोग धार्मिक शिक्षा के खिलाफ नहीं है। अगर धार्मिक शिक्षा मुख्य शिक्षा के साथ दी जाती है तो यह बहुत अच्छी बात है लेकिन मुख्य शिक्षा को वैकल्पिक नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि ये बच्चों के हित में नहीं होगा। हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वालों की दलील थी कि हाई कोर्ट के आदेश से लाखों बच्चे प्रभावित होंगे।
Wednesday, May 8, 2024
Court Imposes Rs. 10,000/- Cost For Filing Affidavit WithoutDeponent's Signature, DirectsRemoval Of OathCommissioner For Fraud:Allahabad High Court
Tuesday, December 26, 2023
IPC, CrPC, और Evidence Act की जगह लेने वाले आपराधिक कानून विधेयक पर राष्ट्रपति की मुहर, बने कानून
प्रस्तावित आपराधिक कानून बिल जांच के दायरे में हैं, जिन पर पहले अधीर रंजन चौधरी और सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल जैसे विपक्षी नेताओं ने चिंता जताई, जिन्होंने मानवाधिकारों के संभावित उल्लंघन और कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा ज्यादतियों के खिलाफ सुरक्षा उपायों की अपर्याप्तता पर प्रकाश डाला है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दोनों सदनों में विधेयक का बचाव किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ये औपनिवेशिक युग के आपराधिक कानूनों से हटकर हैं, जिससे ध्यान सज़ा और निवारण से हटकर न्याय और सुधार पर केंद्रित हो गया है। उन्होंने नागरिक को आपराधिक न्याय प्रणाली के केंद्र में रखने के विधेयक के इरादे पर भी जोर दिया। मंत्री ने अन्य बातों के अलावा, डिजिटलीकरण, सूचना प्रौद्योगिकी और खोज और जब्ती प्रक्रियाओं की अनिवार्य वीडियो रिकॉर्डिंग के प्रावधान पर कानून के जोर पर प्रकाश डाला।
गौरतलब है कि गृह मंत्री शाह ने संसद के मानसून सत्र में तीन आपराधिक कानून सुधार विधेयक पेश किए थे, लेकिन बाद में उन्हें गृह मामलों की स्थायी समिति को भेज दिया गया। पिछले महीने, पैनल ने प्रस्तावित बिलों पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें विभिन्न बदलावों का सुझाव दिया गया। उदाहरण के लिए, इसने सिफारिश की कि व्यभिचार का अपराध- 2018 में ऐतिहासिक जोसेफ शाइन फैसले में संविधान पीठ द्वारा इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि यह महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण है और लैंगिक रूढ़िवादिता को कायम रखता है - इसे संशोधित करने के बाद भारतीय न्याय संहिता में बरकरार रखा जाए।
लाइव लॉ से साभार
Saturday, December 23, 2023
दिल्ली हाईकोर्ट ने सांसदों/विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों के शीघ्र निपटान के लिए निर्देश जारी किए
दिल्ली हाईकोर्ट ने संसद और विधानसभाओं के सदस्यों के खिलाफ नामित अदालतों में लंबित आपराधिक मामलों के शीघ्र और प्रभावी निपटान के लिए निर्देश जारी किए।
एक्टिंग चीफ जस्टिस मनमोहन और जस्टिस मिनी पुष्करणा की खंडपीठ ने राउज एवेन्यू कोर्ट के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश को नामित अदालतों में सांसदों और विधायकों के खिलाफ समान स्तर पर लंबित आपराधिक मामलों को लगभग समान रूप से सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।
अदालत ने कहा,
“हालांकि, इस पहलू पर विचार करते हुए प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, सह-विशेषज्ञ न्यायाधीश (पी.सी. अधिनियम) (सीबीआई) को ऐसे मामलों की प्रकृति और जटिलता और इस तथ्य को भी ध्यान में रखना होगा कि किसी दिए गए मामले में कई आरोपी व्यक्ति हैं, या बहुत बड़ी संख्या में गवाह हैं, जिनसे पूछताछ की जानी है।”
इसमें कहा गया कि नामित अदालतें, जहां तक संभव हो, ऐसे मामलों को सप्ताह में कम से कम एक बार सूचीबद्ध करेंगी और जब तक अत्यंत आवश्यक न हो, उनमें कोई स्थगन नहीं देगी और ऐसे मामलों के शीघ्र निपटान के लिए सभी अपेक्षित कदम उठाएगी।
अदालत ने आगे कहा कि यदि ऐसे आपराधिक मामलों के संबंध में कोई पुनर्विचार याचिका नामित सेशन जज के समक्ष लंबित है तो उन्हें छह महीने के भीतर निपटाने का हर संभव प्रयास किया जाएगा। अदालत ने प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश को नामित न्यायालयों के लिए पर्याप्त बुनियादी ढांचा सुविधा सुनिश्चित करने और उसी के संबंध में एक रिपोर्ट दाखिल करने का भी निर्देश दिया। अदालत ने कहा, “प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, सह-विशेषज्ञ न्यायाधीश (पी.सी. अधिनियम) (सीबीआई), राउज़ एवेन्यू कोर्ट कॉम्प्लेक्स, दिल्ली और इस न्यायालय के केंद्रीय परियोजना समन्वयक (सीपीसी) यह भी सुनिश्चित करेंगे कि नामित न्यायालयों को ऐसी तकनीक अपनाने में सक्षम बनाने के लिए पर्याप्त तकनीकी बुनियादी ढांचा उपलब्ध है, जो प्रभावी और कुशल कार्यप्रणाली और इस संबंध में एक रिपोर्ट दाखिल करें।”
Tuesday, December 19, 2023
कानून के पेशे में अब व्यवस्थित ट्रेनिंग के बिना आने वालों की भीड़ बढ़ रही है -इलाहाबाद हाई कोर्ट (लखनऊ खण्डपीठ)
Monday, October 9, 2023
Court grants divorce to Shikhar Dhawan on ground of mental cruelty.
The Family Court Judge Harish Kumar, Patiala House Court has passed a decree for dissolution of marriage of famous cricketer Shikhar Dhawan and wife Aesha Mukerji on the ground that the wife subjected him to mental agony and cruelty.
Without passing any order on the issue of permanent custody of the son, the Court observed that the wife either did not contest the allegations made by Shikhar Dhawan or did not put up a strong defence.
The contentions of Shikhar Dhawan were accepted by the Court as it was noted that the wife inflicted cruelty by forcing Shikhar Dhawan to live separately from his son for many years.
Shikhar Dhawan has been granted visitation rights and the Court permitted video calls as well.
“Since petitioner is a reputed International Cricketer and has been pride of the nation, subject to petitioner approaching the Union Government of India, it is requested to take up the issue of visitation/custody of the minor son with its counterpart in Australia to help him have regular visitation or chatting with his own son or his permanent custody,"
“He (Dhawan) for no fault of his own had been through immense agony and anguish of living separately from his own son for years. Even though the wife denied the allegation, submitting that though she genuinely wanted to live in India with him, however due to her commitment towards her daughters from her previous marriage requiring her to stay in Australia, she could not come to live in India and that he was well aware of her commitment, yet she did not choose to contest the claim," the judge said in the order."
The wife failed to honor her commitment of coming to India and living with Shikhar Dhawan due to prior commitment to her ex-husband and two daughters and therefore, chose to stay in Australia along with the son from Shikhar Dhawan.
Noting that agony from a long-distance marriage, the Judge held that,
"Hence, it stands proved that the wife backtracked from her assurance of setting up matrimonial home in India after marriage and thus made him suffer a long distance marriage and suffer immense agony and anguish of living separately from his own son for years."
Additionally it was noted that,
Petitioner further alleged that in or around January 2020, the Aesha and the minor son came to India to spend a prolonged period of time, but her daughters stayed back in Australia but still she compelled him to send her daughters AU $15,500 per month (inclusive of mortgage payments) on the pretext that they were struggling to survive."
All the assertions made by Shikhar Dhawan were accepted by the Court including the one that the wife sent defamatory texts to the authorities on the Cricket Board and owners of the Indian Premiere League to ensure maintenance form Dhawan.
Finally, on the grounds of anguish, pain and mental cruetlty, the cricket was granted a decree of divorce by the Family Court.
Sunday, October 8, 2023
आरएसएस ने रूट मार्च आयोजित करने की अनुमति के लिए मद्रास उच्च न्यायालय का रुख किया क्योंकि राज्य ने पिछले साल अदालत के हस्तक्षेप के बावजूद अनुमति देने से इनकार कर दिया था।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने विजयादशमी के अवसर पर संगठन को जुलूस (रूट मार्च) और सार्वजनिक बैठक आयोजित करने की अनुमति देने से इनकार को चुनौती देते हुए मद्रास उच्च न्यायालय का रुख किया है। पिछले साल, इसी तरह, तमिलनाडु सरकार ने अनुमति देने से इनकार कर दिया था और मामला सर्वोच्च न्यायालय तक चला गया था और अदालतों ने राज्य को अनुमति देने का निर्देश दिया था।
तमिलनाडु राज्य ने मद्रास उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की थी, जिसने आरएसएस को राज्य पुलिस को तीन तारीखें देने के लिए कहा था और पुलिस को इनमें से एक तारीख चुनने के लिए कहा था। तीन। तमिलनाडु राज्य की याचिका के बावजूद, शीर्ष अदालत ने कोई अंतरिम आदेश पारित करने से इनकार कर दिया था।
उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने न्यायालय के एकल न्यायाधीश के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें आरएसएस को कुछ अतिरिक्त प्रतिबंधों के साथ केवल परिसर के अंदर तमिलनाडु भर में रूट मार्च आयोजित करने की अनुमति दी गई थी। “…राज्य में प्रत्येक संगठन या राजनीतिक दल की विचारधारा दूसरे के समान या स्वीकार्य होने की आवश्यकता नहीं है। सिर्फ इसलिए कि अन्य संगठन हैं जिनकी अलग विचारधारा है, मांगी गई अनुमति से इनकार नहीं किया जा सकता है”, डिवीजन बेंच ने कहा था। वाद शीर्षक: के.आर.गणेसन बनाम तमिलनाडु राज्य और अन्य।
रंजीत बनकर रकीबुल ने नेशनल शूटर को दिया था लव वाला धोखा, अब आखिरी सांस तक सजा
रांची की एक विशेष सीबीआई अदालत ने गुरुवार को बहुचर्चित नेशनल शूटर तारा शाहदेव के पति को रेप, धोखाधड़ी से शादी करने और अपनी तत्कालीन पत्नी के धर्म परिवर्तन के प्रयास के आरोप में अंतिम सांस तक कैद की सजा सुनाई। यह सजा रंजीत कोहली उर्फ रकीबुल हसन को अलग-अलग दो धाराओं में सुनाई गई। वहीं इसी मामले में झारखंड हाईकोर्ट के पूर्व रजिस्ट्रार (निगरानी) मुश्ताक अहमद को 15 साल एवं कोहली की मां कौशल रानी को 10 साल कैद की सजा सुनाई। यह सजा सीबीआई के विशेष न्यायाधीश पीके शर्मा की अदालत ने सुनाई।
अदालत ने कोहली पर 1.25 लाख एवं अन्य पर 50-50 हजार का जुर्माना भी लगाया है। जुर्माना नहीं देने पर कोहली को अतिरिक्त 18 माह एवं अन्य को अतिरिक्त छह-छह माह की जेल काटनी होगी। सजा के बिंदु पर सुनवाई के दौरान जेल में बंद तीनों अभियुक्तों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से अदालत में पेश किया गया। अदालत ने कहा कि अपराध का तरीका और उसकी गंभीरता को देखते हुए सजा दी गई है।
अदालत ने कोहली को आपराधिक साजिश रचने के साथ एक ही औरत के साथ लगातार दुष्कर्म करने के आरोप में सजा सुनाई है। अन्य दोनों को आपराधिक साजिश रच एक ही महिला के साथ दुष्कर्म की घटना को अंजाम देने के जुर्म में सजा सुनाई गई है। अदालत ने तीनों को 30 सितंबर को दोषी ठहराया था। सीबीआई के वरीय लोक अभियोजक प्रियांशु सिंह की ओर से पेश 26 गवाहों एवं दस्तावेजों के आधार पर यह सजा सुनाई गई।
रजिस्ट्रार ने कराई थी रंजीत से मुलाकात
शूटर के अनुसार, वह अपने पति को पूर्व रजिस्ट्रार मुश्ताक के जरिए जानती थी। मुश्ताक उसके और रंजीत के जबरन निकाह कराने के लिए एक मौलवी को भी लाया था, जिससे उसने पहली बार हिंदू रीति-रिवाज से शादी की थी। इस अपराध के लिए रजिस्ट्रार को सेवा से भी बर्खास्त कर दिया गया था।
शूटर ने 7 जुलाई 2014 को हिंदू परंपरा के अनुसार रंजीत उर्फ रकीबुल हसन से शादी की, जिसने अपना धर्म छिपाया था। 8 जुलाई को निकाह के जरिए उनकी शादी संपन्न कराने की कोशिश की गई। शादी के बाद शूटर को अमानवीय यातनाएं दीं, जिसमें कुत्ते से कटवाना, बुरी तरह पिटाई और धर्म परिवर्तन करने के लिए लगातार धमकियां देना शामिल है। तंग आकर तारा ने 19 जुलाई 2014 को हिंदपीढ़ी थाने में अपने तत्कालीन पति और उसकी मां के खिलाफ मामला दर्ज कराया था।
किस धारा में कितनी सजा और जुर्माना
● रंजीत कोहली (44) भादवि की धारा 376(2)(एन) (लगातार दुष्कर्म) अंतिम सांस तक कैद व जुर्माना 50 हजार। धारा 496 (यह जानते हुए कि यह शादी विधि सम्मत नहीं है फिर भी शादी करना) के आरोप में पांच साल व 25 हजार रुपए जुर्माना।
था। जो अभियुक्तों के कठोर सजा का आधार बना। मामले में पीड़िता के साथ एमबीए छात्र निशांत सिंह, खेलगांव स्टेडियम के मैनेजर कुंदन कुमार साव, कारोबारी रवि कुमार शर्मा, पूर्व मंत्री हाजी हुसैन अंसारी, रांची का काजी काजी जन मो. मुस्ताफुर, सिविल सर्जन रांची डॉ. विजय बिहारी प्रसाद, नई दिल्ली के आरएमएल अस्पताल की सहायक प्रोफेसर डॉ. नेहा, साइबर क्राइम थाना के इंस्पेक्टर रांची के दीपिका प्रसाद, सेवानिवृत्त इंस्पेक्टर दुखहरण ताना भगत व अन्य शामिल हैं।
Sunday, October 1, 2023
रेलवे सुरक्षा बल को एक सशस्त्र बल घोषित किया गया है, फिर भी इसके सदस्य कर्मचारी मुआवजा अधिनियम के तहत लाभ मांग सकते हैं: सुप्रीम कोर्ट
चिकित्सा लापरवाही और रेस इप्सा लोकिटुर | जहां लापरवाही स्पष्ट हो, वहां सबूत का बोझ अस्पताल पर: सुप्रीम कोर्ट
Saturday, January 28, 2023
सुप्रीम कोर्ट ने एक ही दिन में कई जमानत अर्जियां खारिज करने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश खारिज किया
बेंच ने कहा-
रजिस्ट्रार ने तब एक हलफनामा दायर किया था, जिसमें यह कहा गया था कि अपीलकर्ता के कहने पर दायर जमानत आवेदन पहली बार 02.07.2021 को सूचीबद्ध किया गया था और उसे अंतरिम सुरक्षा प्रदान की गई थी और उसके बाद मामला लगभग न्यायालय के समक्ष आया था। एक साल बाद 27.09.2022 को पेशी न होने के कारण जमानत अर्जी अभियोजन न होने के कारण खारिज कर दी गई। पीठ के समक्ष अपीलकर्ता ने 27.09.2022 को एक अदालत द्वारा पारित लगभग 50 आदेशों को रिकॉर्ड में रखा, जिसमें गैर-अभियोजन के लिए व्यक्तिगत आवेदकों द्वारा जमानत अर्जी को खारिज कर दिया गया था। न्यायालय ने यह भी देखा कि आदेश न्यायालय द्वारा पारित मानक प्रारूप में हैं।
पहले उदाहरण में हम हाईकोर्ट द्वारा डिफ़ॉल्ट रूप से जमानत अर्जी को खारिज करने के आदेश पारित करने में अपनाई गई इस तरह की प्रथा को अस्वीकार करते हैं। साथ ही अपीलकर्ता की ओर से यह भी उचित नहीं था कि वह उस तारीख को उपस्थित न हो जिस दिन जमानत याचिका दायर की गई थी। मामला सूचीबद्ध था। वह भी 27.09.2022 के आदेश को वापस लेने के लिए आवेदन करने के लिए स्वतंत्र था, जिसे इस न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गई थी।"
पहले उदाहरण में हम हाईकोर्ट द्वारा डिफ़ॉल्ट रूप से जमानत अर्जी को खारिज करने के आदेश पारित करने में अपनाई गई इस तरह की प्रथा को अस्वीकार करते हैं। साथ ही अपीलकर्ता की ओर से यह भी उचित नहीं था कि वह उस तारीख को उपस्थित न हो जिस दिन जमानत याचिका दायर की गई थी। मामला सूचीबद्ध था। वह भी 27.09.2022 के आदेश को वापस लेने के लिए आवेदन करने के लिए स्वतंत्र था, जिसे इस न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गई थी।"
स्रोत-लाइव लॉ
Saturday, November 12, 2022
Allahabad High Court ordered the Bar Council to investigate against the lawyer running the business - the lawyer had written an FIR for fraud in the business.
Tuesday, November 8, 2022
आरक्षण नीति अनिश्चित काल तक नहीं टिक सकती : सुप्रीम कोर्ट
संविधान पीठ के तीन न्यायाधीशों ने बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनों मतों का गठन करने वाले विचारों में कहा कि शिक्षा और रोजगार में आरक्षण की नीति अनिश्चित काल तक जारी नहीं रह सकती है।
न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी, जो बहुमत के फैसले का हिस्सा थीं, ने कहा कि आरक्षण नीति में एक समय अवधि होनी चाहिए। न्यायमूर्ति त्रिवेदी ने कहा, "हमारी आजादी के 75 साल के अंत में, हमें परिवर्तनकारी संवैधानिकता की दिशा में एक कदम के रूप में समग्र रूप से समाज के व्यापक हित में आरक्षण प्रणाली पर फिर से विचार करने की जरूरत है।"
उन्होंने कहा कि लोक सभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए कोटा संविधान के लागू होने के 80 साल बाद समाप्त हो जाएगा। 25 जनवरी, 2020 से 104वें संविधान संशोधन के कारण संसद और विधानसभाओं में एंग्लो-इंडियन समुदायों का प्रतिनिधित्व पहले ही बंद हो गया है।
"इसलिए, संविधान के अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 16 में प्रदान किए गए आरक्षण और प्रतिनिधित्व के संबंध में विशेष प्रावधानों के लिए एक समान समय सीमा, यदि निर्धारित की गई है, तो यह एक समतावादी, जातिविहीन और वर्गहीन समाज की ओर अग्रसर हो सकता है।" न्यायमूर्ति त्रिवेदी ने अवलोकन किया।
हालांकि स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है, अनुच्छेद 15 और 16 के तहत कोटा रोकने पर न्यायमूर्ति त्रिवेदी के विचार में ईडब्ल्यूएस आरक्षण भी शामिल होगा।
न्यायमूर्ति पी.बी. पारदीवाला, जिन्होंने ईडब्ल्यूएस कोटा को बरकरार रखने वाले बहुमत का गठन किया, ने कहा, "आरक्षण एक अंत नहीं है, बल्कि एक साधन है - सामाजिक और आर्थिक न्याय को सुरक्षित करने का एक साधन है। आरक्षण को निहित स्वार्थ नहीं बनने देना चाहिए। वास्तविक समाधान, हालांकि, उन कारणों को समाप्त करने में निहित है, जिन्होंने समुदाय के कमजोर वर्गों के सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक पिछड़ेपन को जन्म दिया है।"
उन्होंने कहा कि "लंबे समय से विकास और शिक्षा के प्रसार" के परिणामस्वरूप कक्षाओं के बीच की खाई काफी हद तक कम हो गई है। पिछड़े वर्ग के सदस्यों का बड़ा प्रतिशत शिक्षा और रोजगार के स्वीकार्य मानकों को प्राप्त करता है। उन्हें पिछड़ी श्रेणियों से हटा दिया जाना चाहिए ताकि उन लोगों की ओर ध्यान दिया जा सके जिन्हें वास्तव में मदद की जरूरत है।
न्यायमूर्ति पारदीवाला ने कहा, "पिछड़े वर्गों की पहचान के तरीके और निर्धारण के तरीकों की समीक्षा करना और यह भी पता लगाना बहुत जरूरी है कि पिछड़े वर्ग के वर्गीकरण के लिए अपनाया या लागू किया गया मानदंड आज की परिस्थितियों के लिए प्रासंगिक है या नहीं।"
न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट ने बाबा साहेब अम्बेडकर की टिप्पणियों को याद दिलाया कि आरक्षण को अस्थायी और असाधारण के रूप में देखा जाना चाहिए "अन्यथा वे समानता के नियम को खा जाएंगे
Friday, October 14, 2022
XXX सीरीज मामले में एकता कपूर को सुप्रीम कोर्ट की फटकार, कहा- ‘युवा पीढ़ी के दिमाग को दूषित कर रही हैं’
एकता कपूर के ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दिखाई गई वेब सीरीज XXX को लेकर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी फटकार लगाई। इस सीरीज को लेकर लंबे समय से मामला कोर्ट में चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने एकता कपूर के लिए कहा कि वह देश की युवा पीढ़ी के दिमाग को दूषित कर रही हैं। दरअसल एकता कपूर की ओर से एक याचिका दायर की गई। सुप्रीम कोर्ट ने इसके साथ ही चेतावनी दी कि ऐसी कोई और दलील उनके पास आती है तो उनसे एक लागत वसूल की जाएगी।
वेब सीरीज में आपत्तिजनक सीन को लेकर मामला
सुप्रीम कोर्ट एकता कपूर द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था। ओटीटी प्लेटफॉर्म ऑल्ट बालाजी पर प्रसारित वेब सीरीज XXX में आपत्तिजनक कॉन्टेंट के जरिए सैनिकों के कथित रूप से अपमान करने और उनके परिवारों की भावानाओं को आहत करने के लिए एकता कपूर के खिलाफ जारी गिरफ्तारी वारंट को चुनौती दी गई थी। बिहार के बेगूसराय की एक ट्रायल कोर्ट ने एक पूर्व सैनिक शंभू कुमार की शिकायत पर वारंट जारी किया था जिसमें आरोप लगाया गया कि वेब सीरीज के दूसरे सीजन में एक सैनिक की पत्नी के साथ आपत्तिजनक दृश्य दिखाए गए थे।
पीटीआई के अनुसार, वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी एकता की ओर से पेश हुए और कोर्ट से उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के लिए कहा। रोहतगी ने कहा कि वेब सीरीज को सब्सक्रिप्शन के बाद ही देखा जा सकता है और हमारे देश में अपनी पसंद से देखने की स्वतंत्रता है। न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी और न्यायमूर्ति सीटी रविकुमार की पीठ ने एकता की तब आलोचना की जब वकील ने कहा कि इस मामले में पटना हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई है लेकिन वहां जल्द सुनवाई के लिए सूचीबद्ध की उम्मीद नहीं है।
एकता को कोर्ट ने चेतावनी भी दी
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा, 'आप इस देश की युवा पीढ़ी के दिमाग को प्रदूषित कर रही हैं। यह सभी के लिए उपलब्ध है। ओटीटी पर कॉन्टेंट सभी के लिए उपलब्ध है। आप लोगों को किस तरह का विकल्प दे रही हैं। आप युवाओं के दिमाग को दूषित कर रही हैं।'
कोर्ट ने आगे एकता को चेतावनी दी, 'हर बार जब आप इस कोर्ट में आते हैं... हम इसकी सराहना नहीं करते। हम इस तरह की याचिका दायर करने के लिए आप से एक लागत लेंगे। मिस्टर रोहतगी कृपया इसे अपने क्लाइंट को बताएं। सिर्फ इसलिए कि आप अच्छे वकीलों की सेवाएं ले सकते हैं... यह अदालत उन लोगों के लिए नहीं है जिनके पास आवाज नहीं है। यह अदालत उनके लिए काम करती है जिनके पास आवाज नहीं है। जिन लोगों के पास हर तरह की सुविधाएं हैं अगर उन्हें न्याय नहीं मिल सकता है तो आम आदमी की स्थिति के बारे में सोचें। हमने आदेश देखा और हमारी आपत्ति है।'
कोर्ट ने दिया सुझाव
कोर्ट ने याचिका को लंबित रखा और सुझाव दिया कि पटना हाई कोर्ट में मामले की सुनवाई की स्थिति की जांच के लिए एक स्थानीय वकील को नियुक्त किया जा सकता है।
Sunday, September 25, 2022
केरल हाई कोर्ट ने बंद को लेकर PFI नेताओं के खिलाफ स्वत: संज्ञान लिया
23 सितंबर, 2022र
केरल उच्च न्यायालय ने आज दक्षिणी राज्य के भीतर आज हड़ताल की घोषणा को लेकर भारत के कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन (पीएफआई) और उसके राज्य महासचिव के खिलाफ स्वत: संज्ञान लिया।
न्यायमूर्ति एके जयशंकरन नांबियार ने कहा कि 2019 के अपने आदेश के बावजूद, पीएफआई ने कल अचानक रोक लगा दी।
अदालत ने कहा, "हमारे पहले के आदेश में सोची गई प्रक्रिया का पालन किए बिना उपरोक्त व्यक्तियों की हड़ताल का आह्वान करना, स्पष्ट रूप से, उपरोक्त आदेश के भीतर इस अदालत के निर्देशों की अवमानना के समान है।"
अदालत ने स्वत: संज्ञान लेते हुए पुलिस को निर्देश जारी किया कि हड़ताल के फैसले का समर्थन नहीं करने वालों की सार्वजनिक और निजी संपत्ति को किसी भी तरह की क्षति या क्षति को रोकने के लिए पर्याप्त उपायों की पुष्टि की जाए।
"विशेष रूप से, पुलिस अवैध हड़ताल के समर्थकों द्वारा इस तरह की किसी भी गतिविधि को देखने के लिए भी कदम उठाएगी और इस तरह के उदाहरणों का विवरण देने वाली एक रिपोर्ट इस अदालत के सामने रखेगी और इसलिए सार्वजनिक / निजी को नुकसान की सीमा, यदि कोई हो। संपत्ति। उक्त विवरण इस अदालत के लिए आवश्यक होगा ताकि अवैधता के अपराधियों से इस तरह के नुकसान की वसूली के लिए उपचारात्मक कार्रवाई की आवश्यकता हो, "न्यायमूर्ति नांबियार ने कहा।
अदालत ने पुलिस से किसी भी या सभी सार्वजनिक-सेवा निगम सेवाओं को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करने के लिए कहा, जो अवैध हड़ताल का समर्थन करने वालों के हाथों हिंसा की आशंका जताते हैं।
राज्य के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी नोट किया कि मीडिया घराने "फ्लैश हड़ताल" की खबरों को रिपोर्ट कर रहे थे, आदेश के छोटे प्रिंट का उल्लेख किए बिना अदालत ने सात दिनों के सार्वजनिक नोटिस के बिना इसे अवैध घोषित कर दिया।
"इसलिए, हम एक बार फिर मीडिया से यह पुष्टि करने के लिए अनुरोध करना आवश्यक समझते हैं कि जब भी इस तरह की अवैध फ्लैश हड़ताल का संबंध है, और यह स्पष्ट है कि उक्त हड़ताल इस अदालत के आदेशों का उल्लंघन है, तो आम जनता को विधिवत सूचित किया जाए। उक्त तथ्य, “अदालत ने कहा।
इसमें कहा गया है कि हड़ताल के निर्णय की वैधता के संबंध में अंतिम जनता की आशंकाओं को दूर करने के लिए और सार्वजनिक सेवा निगम सेवाओं के प्रदाताओं को भविष्य में इस तरह की अवैध हड़तालों पर ध्यान देने से रोकने के लिए यह काफी हद तक पर्याप्त होगा।
अदालत ने अब मामले को 29 सितंबर को सरकार की रिपोर्ट के लिए पोस्ट किया है।
एचसी ने 7 जनवरी, 2019 को यह मजबूत किया कि फ्लैश हड़ताल, यानी उन हड़तालों / हड़तालों को 7 दिनों की सार्वजनिक सूचना देने की प्रक्रिया पर जोर दिए बिना, अवैध / असंवैधानिक माना जाएगा, जो हड़ताल के लिए बुलाने वाले व्यक्तियों / पार्टी के लिए प्रतिकूल परिस्थितियों में शामिल होंगे।
Monday, September 12, 2022
ज्ञानवापी मामले पर बड़ा अपडेट: वाराणसी कोर्ट ने मुस्लिम पक्षों की याचिका खारिज की- महिला उपासकों द्वारा दायर वाद चलेगा
वाद की मेरिट पर बहस 22 सितंबर से शुरू होगी।
अदालत ने अंजुमन समिति द्वारा मुकदमे की पोषणीयता को चुनौती देने वाली आदेश 7 नियम 11 सीपीसी की याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि हिंदू उपासकों द्वारा दायर मुकदमा विचारणीय है।
यह माना गया है कि मामला पूजा स्थल अधिनियम या वक्फ अधिनियम द्वारा वर्जित नहीं है।
24 अगस्त को, जिला न्यायाधीश अजय कृष्ण विश्वेश ने श्रृंगार गौरी मंदिर में पूजा के अधिकार की मांग करने वाली पांच महिलाओं द्वारा दायर एक याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
याचिका पर अदालत ने पहले मस्जिद के मैदान की वीडियोग्राफी और सर्वेक्षण का आदेश दिया था। वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर से सटे ज्ञानवापी मस्जिद के अंदर किए गए वीडियोग्राफी सर्वेक्षण की रिपोर्ट जिला अदालत को पहले ही मिल चुकी थी।
हिंदू याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने पहले दावा किया था कि एक छोटे से तालाब में एक ‘शिवलिंग’ खोजा गया था, जिसके बाद अदालत ने आदेश दिया कि क्षेत्र को सील कर दिया जाए।
दूसरी ओर, मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों ने इस दावे का खंडन करते हुए दावा किया कि ‘शिवलिंग’ वास्तव में एक ‘फव्वारा’ था। उन्होंने यह भी दावा किया कि वाराणसी की अदालत ने स्थान सील करने का आदेश जारी करने से पहले मुस्लिम वकीलों की बात नहीं सुनी।
याचिका की सुनवाई के दौरान, हिंदू याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने दावा किया कि मुगल सम्राट औरंगजेब ने 17 वीं शताब्दी में मंदिर के एक हिस्से को ध्वस्त कर दिया था।
मुस्लिम पक्ष ने दावा किया कि मस्जिद औरंगजेब के शासनकाल से पहले मौजूद थी और इसका उल्लेख भूमि अभिलेखों में भी किया गया था।
परिसर दशकों से दोनों समुदायों के बीच विवाद का एक स्रोत रहा है, लेकिन राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट के अनुकूल फैसले के बाद काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर को “पुनर्प्राप्त” करने के लिए हिन्दू संगठनों द्वारा एक नए सिरे से जोर दिया गया था।
Tuesday, August 23, 2022
पॉक्सो एवं एस. सी एस.टी.एक्ट के अंतर्गत अभियुक्त को आजीवन कारावास की सज़ा
हस्तलेख परीक्षण के लिये मूल दस्तावेज आवश्यक - इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला देते हुए कहा दस्तावेज़ की केवल फोटो-कॉपी होने पर हस्ताक्षरों की फोरेंसिक अथवा हस्तलेखन विशेष...
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HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD Hon’ble Dr. Yogendra Kumar Srivastava, J. APPLICATION U/S 482 No. – 12300 of 2021 Yas Moha...
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