Thursday, September 3, 2026

Trial court need not hold a mini-trial at the stage of granting an ex parte ad interim injunction- Calcutta High Court

Injunction - **Ex parte ad interim injunction** granted by the trial court - Found to be based on relevant materials and pleadings on oath - Appellate court cannot interfere unless findings are perverse or unreasoned - Trial court need not hold a mini-trial at the stage of granting an ex parte ad interim injunction. A. Code of Civil Procedure, 1908 Order XXXIX, Rules 1 and 2 Injunction - Ex parte ad interim injunction - Trial court granted the injunction after considering plaint averments, documents, and photographic evidence - Injunction was granted to protect possession of plaintiffs over suit property (driveway and central lawn) - Held, at the ex parte stage, court needs to assess foundational ingredients for granting injunction, not conduct a mini-trial. B. Property Law Conveyance deed - Common areas and facilities - Plaintiffs' deed included common areas such as driveways and passageways - Agreement between developers and builders incorporated in deeds - Wide language in deed's habendum clause supports plaintiffs' claim over common areas. C. Evidence Importance of agreement relied upon by plaintiffs - Agreement dated January 5, 2006 forming basis of plaintiffs' rights - Defendant, being a signatory, has duty to produce it - Trial court justified in relying on plaintiffs' averments and documents at ad interim stage.
D. Appellate Review Scope of appellate court's interference with ex parte injunction orders - Held, interference is permissible only if trial court's findings are perverse or unreasoned - Appellate court may supply additional reasons if concurring with trial court's conclusion.

Monday, August 31, 2026

केवल धनराशि मिलना ही रिश्वत लेने आधार नहीं माना जा सकता- सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया कि यदि अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहता है, तो केवल कथित रिश्वत की रकम बरामद होने के आधार पर आरोपी की दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती।

जस्टिस उज्ज्वल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने गुजरात हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें ग्राम पंचायत के पूर्व तलाटी-सह-मंत्री और चपरासी की दोषसिद्धि बरकरार रखी गई थी। मामला आय प्रमाण पत्र जारी करने के बदले ₹120 की कथित रिश्वत मांगने से संबंधित था। एंटी-करप्शन ब्यूरो द्वारा बिछाए गए ट्रैप में चपरासी के पास से 20 रुपए का कथित रिश्वत का नोट बरामद हुआ था।

सुप्रीम कोर्ट ने साक्ष्यों का विश्लेषण करते हुए पाया कि शिकायतकर्ता के बयानों में महत्वपूर्ण विरोधाभास थे। कथित रूप से 120 रुपए की मांग तलाटी-सह-मंत्री द्वारा की गई थी, लेकिन उसके पास से कोई रकम बरामद नहीं हुई, जबकि चपरासी के पास 20 रुपए का नोट मिला, जिसके द्वारा रिश्वत मांगने का कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि एंटी-करप्शन ब्यूरो ने शिकायतकर्ता को मांग किए जाने पर पूरी 120 रुपये की रकम देने का निर्देश दिया था, लेकिन आय प्रमाण पत्र जारी होने के बाद शिकायतकर्ता ने केवल 20 रुपए चपरासी को दिए। इस परिस्थिति का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण भी अभियोजन पक्ष नहीं दे सका।

पीठ ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 20 के तहत वैधानिक अनुमान तभी लागू हो सकता है जब अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग को पहले विश्वसनीय रूप से साबित कर दे। यदि शुरुआती मांग ही साबित नहीं होती है, तो केवल आरोपी के पास से 20 रुपए की बरामदगी अभियोजन के मामले को दोबारा मजबूत नहीं कर सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने N. Vijayakumar v. State of Tamil Nadu के फैसले का हवाला देते हुए यह भी स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती कि आरोपी सरकारी कर्मचारी था और उसके पास से “tainted money” बरामद हुआ था। कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि दोनों आरोपियों को आपराधिक साजिश के आरोप से बरी किया गया था।

इसके अतिरिक्त, पीठ ने तलाटी-सह-मंत्री के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी पर भी सवाल उठाया और पाया कि डिप्टी डिस्ट्रिक्ट डेवलपमेंट ऑफिसर द्वारा दी गई मंजूरी वैध नहीं थी, क्योंकि अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि संबंधित अधिकारी के पास ऐसी मंजूरी देने का अधिकार था। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोषसिद्धि को केवल मंजूरी की इस कमी के आधार पर नहीं, बल्कि अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों द्वारा आरोपों को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहने के आधार पर रद्द किया जा रहा है।

फैसले में चपरासी द्वारा 20 रुपए मिलने के संबंध में दिए गए बचाव को भी परिस्थितियों के अनुसार संभावित माना गया। अंततः सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और गुजरात हाईकोर्ट के फैसलों को रद्द करते हुए दोनों अपीलकर्ताओं को बरी कर दिया।


Monday, August 24, 2026

फुटपाथों को कब्जा मुक्त कराने के लिये निर्देश जारी

सुप्रीम कोर्ट ने फुटपाथ की अहमियत को रेखांकित करते हुए सोमवार को कहा कि फुटपाथ मानव जीवन का अहम हिस्सा है। पैदल चलने वालों के सुरक्षित आवागमन के अधिकार को गंभीरता से लेते हुए शीर्ष अदालत ने सभी राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों से जवाब मांगा है कि सड़कों पर पैदल यात्रियों के लिए सही ढंग से चिन्हित और कब्जा मुक्त फुटपाथ सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाये गए हैं।

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और आलोक अराधे की पीठ ने सड़क पर पैदल चलने वालों के लिए तय और सुरक्षित स्थान सुनिश्चित करने से जुड़े मामले का दायरा बढ़ाते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पक्षकार बनाया है। कोर्ट ने केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सालिसिटर जनरल (एएसजी) केएम नटराज से कहा कि पहला कदम पैदल चलने वालों के लिए जगह को सही ढंग से चिन्हित करना है। लोगों को यह भरोसा होना चाहिए कि सड़क पर उनके लिए सुरक्षित जगह मौजूद है और उन्हें उसी जगह पर चलना है। केंद्र सरकार की ओर से पेश एएसजी ने कोर्ट को बताया कि सड़कें राज्य का विषय हैं, इसके बावजूद सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय, आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ ही भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआइ) को पैदल चलने वालों के लिए अलग जगह उपलब्ध कराने (फुटपाथ) संबंधी एडवाइजरी जारी की है।
स्रोत-जागरण

Tuesday, August 4, 2026

हस्तलेख परीक्षण के लिये मूल दस्तावेज आवश्यक - इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला देते हुए कहा दस्तावेज़ की केवल फोटो-कॉपी होने पर हस्ताक्षरों की फोरेंसिक अथवा हस्तलेखन विशेषज्ञ जांच नहीं कराई जा सकती है। दस्तावेज़ की केवल फोटो-कॉपी होने पर हस्ताक्षरों की फोरेंसिक अथवा हस्तलेखन विशेषज्ञ जांच नहीं कराई जा सकती क्योंकि फोटोकॉपी में लिखावट का दबाव और स्याही का प्रवाह गायब हो जाता है, जिससे वैज्ञानिक राय देना असंभव है। एटा (उत्तर प्रदेश) में एक दुकान से किरायेदार की बेदखली की कार्यवाही चल रही थी।

किरायेदार ने अपने बचाव में वर्ष 2005 के किरायानामे की फोटो-कॉपी पेश की और कहा कि मूल प्रति मकान मालिक के पास है। उसने कोर्ट से गुहार लगाई कि फोटो-कॉपी पर मौजूद मकान मालिक के कथित हस्ताक्षरों की जांच हस्तलेखन विशेषज्ञ से कराई जाए।

किराया प्राधिकरण और किराया अधिकरण दोनों ने इस अर्ज़ी को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि मूल दस्तावेज़ के बिना केवल फोटो-कॉपी पर फोरेंसिक जांच का कोई कानूनी औचित्य नहीं है। इसके खिलाफ किरायेदार हाईकोर्ट पहुँचा। न्यायमूर्ति योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने याचिका खारिज करते हुए मुख्य कानूनी व वैज्ञानिक सिद्धांत देते हुए कहा कि फोटोकॉपी में वैज्ञानिक गुणों का अभाव रहता है। कोर्ट ने आगे कहा कि फोरेंसिक विशेषज्ञ केवल अक्षरों का बाहरी आकार नहीं देखता, बल्कि लिखावट की गति, दबाव स्याही का प्रवाह और कलम उठाने के तरीके की जांच करता है। फोटोकॉपी में धुंधलापन, विकृति, छाया और दबाव गायब हो जाते हैं। कोर्ट ने किरायेदार की इस दलील को खारिज कर दिया कि मकान मालिक के बयान/स्वीकारोक्ति के आधार पर जांच होनी चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी स्वीकारोक्ति इस मूल आवश्यकता को खत्म नहीं कर सकती कि फोरेंसिक जांच के लिए भेजी जाने वाली सामग्री विश्वसनीय वैज्ञानिक परीक्षण के योग्य हो। हाईकोर्ट ने साफ किया कि याचिकाकर्ता मूल दस्तावेज़ न होने पर अन्य स्वीकार्य साक्ष्यों जैसे किराया रसीदें या मौखिक गवाही के आधार पर अपना पक्ष साबित करने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन फोटोकॉपी को विशेषज्ञ जांच के लिए नहीं भेजा जा सकता।

Sunday, August 2, 2026

पत्नी के गैर वैवाहिक सबन्ध होने पर गुजारा भत्ता नहीं- सुप्रीम कोर्ट

पति यदि शुरुआती चरण में ही ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर पत्नी के व्यभिचार  को प्रथमदृष्टया साबित कर देता है, तो दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125(4) के तहत पत्नी को अंतरिम गुज़ारा-भत्ता देने से इनकार किया जा सकता है। यह महत्वपूर्ण टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने अपने हालिया फैसले में की।

मामले में पति ने दावा किया कि पत्नी के एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर के कारण वह धारा 125(4)दंड प्रक्रिया संहिता के तहत किसी भी प्रकार के गुज़ारा-भत्ते की हकदार नहीं है और इसके समर्थन में तस्वीरें एवं अन्य साक्ष्य भी पेश किए। हालांकि, ट्रायल कोर्ट और बाद में हाईकोर्ट ने यह कहते हुए पति की आपत्ति खारिज कर दी कि ऐसे मुद्दे पर विचार केवल अंतिम सुनवाई के समय किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों अदालतों के आदेशों को रद्द करते हुए कहा कि यदि पति प्रारंभिक स्तर पर ही पर्याप्त साक्ष्यों से अपना दावा प्रथमदृष्टया स्थापित कर देता है, तो अदालत अंतरिम गुज़ारा-भत्ते पर निर्णय लेते समय धारा 125(4) की आपत्ति पर भी विचार कर सकती है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि निचली अदालतों का यह मानना कि ऐसे प्रश्न पर केवल अंतिम निर्णय के समय ही विचार किया जा सकता है, कानून के उद्देश्य के विपरीत है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को पुनः ट्रायल कोर्ट भेज दिया ताकि पति की आपत्ति पर गुण-दोष के आधार पर निर्णय लिया जा सके।

Saturday, July 25, 2026

मेंटेनेंस ऑर्डर लागू न करने पर कंटेम्प्ट प्रोसीडिंग्स हो सकती हैं: HC ने फैमिली कोर्ट के जजों को चेतावनी दी

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माना कि पारिवारिक न्यायालय भरण पोषण दावेदारों को मासिक भरण पोषण आदेशों को लागू करने के लिए लगातार निष्पादन आवेदन दायर करने के लिए मजबूर नहीं कर सकते हैं और ऐसे आदेशों के निष्पादन को नियंत्रित करने वाले कानून का कड़ाई से पालन करने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने धारा 125 सीआरपीसी / धारा 144 बीएनएसएस के तहत भरण पोषणआदेश के निष्पादन से निपटने में पारिवारिक न्यायालय द्वारा अपनाए गए गलत दृष्टिकोण को खारिज कर दिया। 
न्यायालय ने यह चेतावनी देते हुए निष्कर्ष निकाला कि न्यायिक अधिकारियों द्वारा सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के बाध्यकारी निर्देशों को लागू करने में विफलता अनुशासनात्मक और अवमानना कार्यवाही को आमंत्रित कर सकती है।

Friday, July 17, 2026

फर्जी हस्ताक्षर करने के लिए याची एवं उसके अधिवक्ता के विरुद्ध कार्यवाही

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में फर्जी हस्ताक्षर और दस्तावेजों के कथित इस्तेमाल को गंभीर मानते हुए याचिकाकर्ता और उसके अधिवक्ता के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दिया है,
यह जनहित याचिका (PIL) कुशीनगर स्थित तमकुहीराज एजुकेशन सोसाइटी और फतेह मेमोरियल इंटर कॉलेज के प्रबंधक की नियुक्ति में कथित अनियमितताओं को चुनौती देने से संबंधित थी।

सुनवाई के दौरान एक प्रतिवादी ने आरोप लगाया कि याचिका वापस लेने के लिए दायर आवेदन पर उसके अधिवक्ता के फर्जी हस्ताक्षर किए गए हैं। साथ ही यह भी दावा किया गया कि याचिकाकर्ता की ओर से पेश होने वाला अधिवक्ता कथित रूप से काल्पनिक पहचान का इस्तेमाल कर रहा था और अलग-अलग तारीखों पर अलग-अलग व्यक्ति स्वयं को उसका वकील बताकर अदालत में पेश हुए।

हाईकोर्ट ने मामले की जांच के लिए दस्तावेज एफएसएल, लखनऊ भेजे। एफएसएल रिपोर्ट में विभिन्न दस्तावेजों पर किए गए हस्ताक्षरों में गंभीर विसंगतियां पाई गईं। संबंधित अधिवक्ता ने बीमारी के कारण हस्ताक्षरों में बदलाव का स्पष्टीकरण दिया, लेकिन अदालत इससे संतुष्ट नहीं हुई।

खंडपीठ ने उपलब्ध सामग्री के आधार पर प्रथम दृष्टया जालसाजी और दस्तावेजों में हेरफेर का मामला माना और BNSS की धारा 379 के तहत सक्षम मजिस्ट्रेट, प्रयागराज के समक्ष शिकायत दर्ज कर आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया। साथ ही अदालत ने कहा कि चूंकि जनहित याचिका की शुरुआत ही प्रथम दृष्टया फर्जीवाड़े से प्रभावित प्रतीत होती है, इसलिए मजिस्ट्रेट के निर्णय तक याचिका की आगे की सुनवाई स्थगित रहेगी।
Case Title: Sangeeta Gupta v. State of U.P. and 4 Others | PIL No. 450 of 2025
खंडपीठ: मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली एवं न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेन्द्र

Monday, July 13, 2026

चार्ज शीट दाखिल होने पर प्रोटेस्ट दाखिल नहीं किया जा सकता - मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस जय कुमार पिल्लई ने एक अहम निर्णय में स्पष्ट किया कि यदि जांच एजेंसी किसी मामले में आरोपपत्र (Charge Sheet) दाखिल करती है, तो आरोपी को उसके खिलाफ विरोध याचिका (Protest Petition) दायर कर आरोप तय होने से पहले अलग से सुनवाई कराने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है। ऐसी स्थिति में आरोपी के पास उपलब्ध कानूनी उपाय केवल आरोपमुक्ति (Discharge) की मांग करना है।

यह टिप्पणी उस मामले में की गई, जिसमें एक महिला ने आरोपी पर शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने का आरोप लगाया था। पुलिस ने जांच के बाद भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 के तहत आरोपपत्र दाखिल किया, जबकि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध प्रथम दृष्टया साक्ष्यों के आधार पर BNS की धारा 69 और धारा 296 के तहत आरोप तय किए।

आरोपी ने आरोपपत्र और संज्ञान आदेश को चुनौती देते हुए विरोध याचिका दायर की थी, लेकिन हाईकोर्ट ने माना कि उसके तर्क वास्तव में आरोपमुक्ति की मांग से जुड़े थे। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोप तय किया जाना इस बात का संकेत है कि आरोपमुक्ति की मांग अस्वीकार कर दी गई थी। साथ ही, विरोध याचिका पर अलग से आदेश न देने मात्र से पूरी कार्यवाही अवैध नहीं हो जाती।
वाद शीर्षक: पार्थ कुमार तिवारी बनाम मध्य प्रदेश राज्य व अन्य (Cr.R. No. 2569/2026)

Thursday, July 9, 2026

तलाक के बाद पुनर्विवाह कर लेने पर पूर्व पति से गुजारा भत्ता क्यों - इलाहाबाद हाई कोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी की पीठ ने झांसी के अतिरिक्त प्रधान जज, परिवार न्यायालय यह स्पष्ट करने को कहा है कि जब रिकॉर्ड पर यह तथ्य मौजूद था कि तलाक के बाद पत्नी ने दूसरा विवाह कर लिया है, तब भी पहले पति को पत्नी के लिए ₹10,000 प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का आदेश किस आधार पर पारित किया गया।
 मामले के अनुसार, 30 जुलाई 2025 को झांसी फैमिली कोर्ट ने पति-पत्नी के बीच तलाक की डिक्री पारित की थी। इसके लगभग एक महीने बाद पत्नी ने दूसरा विवाह कर लिया। पति का दावा है कि पत्नी ने अपने शपथपत्र में स्वयं पुनर्विवाह की जानकारी दी थी और CrPC की धारा 125 के तहत चल रही गुजारा भत्ता की कार्यवाही में उसने इस संबंध में आपत्ति भी दर्ज कराई थी। इसके बावजूद फैमिली कोर्ट ने पत्नी के लिए ₹10,000 प्रतिमाह और पुत्र के लिए ₹5,000 प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का आदेश पारित कर दिया।
 इस आदेश को चुनौती देते हुए पति ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया और कहा कि वह अपने पुत्र के भरण-पोषण की राशि देने को तैयार है तथा उसका भुगतान भी कर रहा है, लेकिन पुनर्विवाह कर चुकी पत्नी को पहले पति से गुजारा भत्ता देने का आदेश कानून के अनुरूप नहीं है। उल्लेखनीय है कि CrPC की धारा 125 के अनुसार, तलाकशुदा महिला तभी गुजारा भत्ता पाने की पात्र होती है, जब तक उसने दूसरा विवाह न किया हो।
 सुनवाई के दौरान जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी ने फैमिली कोर्ट के जज श्री हरिशचंद्र से स्पष्टीकरण मांगा है और मामले में पत्नी को नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई 21 जुलाई तय की है।

Monday, July 6, 2026

मोरमुगाओ पोर्ट से शिवाजी की प्रतिमा हटाने के बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें मोरमुगाओ पोर्ट अथॉरिटी की ज़मीन से छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा हटाने का आदेश दिया गया था।
न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति शील नागू की आंशिक बेंच हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि हाई कोर्ट ने अंतरिम चरण में ही अंतिम राहत दे दी थी।
हालांकि, बेंच की अनिच्छा को देखते हुए, याचिकाकर्ताओं ने मामला वापस लेने का विकल्प चुना और इसे वापस लिए जाने के रूप में खारिज कर दिया गया। बेंच ने याचिकाकर्ताओं को हाई कोर्ट में उचित आवेदन दायर करके अपने आदेश में बदलाव की मांग करने की स्वतंत्रता दी।
संक्षेप में, विवादित आदेश के माध्यम से, हाई कोर्ट ने पोर्ट अथॉरिटी की ज़मीन से प्रतिमा को हटाने का आदेश दिया था, यह कहते हुए कि इसे स्थानीय कानूनों का "घोर उल्लंघन" करते हुए स्थापित किया गया था और इसका निर्माण अवैध रूप से किया गया था।
 न्यायमूर्ति वाल्मीकि मेनेजेस और न्यायमूर्ति अमित जमसंदेकर की खंडपीठ ने अधिकारियों और गोवा प्रशासन को "मूक दर्शक" बने रहने और अवैध रूप से प्रतिमा स्थापित होने देने के लिए फटकार लगाई।

Trial court need not hold a mini-trial at the stage of granting an ex parte ad interim injunction- Calcutta High Court

Injunction - **Ex parte ad interim injunction** granted by the trial court - Found to be based on relevant materials and pleadings on oath -...