Tuesday, October 20, 2026

Motor accident claim Compensation Increased


Motor Vehicles Act - Death claim - Enhancement of compensation - Deceased aged 23 years working as Security Guard - Claimants held entitled to addition of 40% towards future prospects in view of Pranay Sethi - Parents and brothers of deceased held entitled to compensation under head of loss of consortium - Award of Tribunal enhanced from Rs.9,48,000/- to Rs.19,83,600/- with interest @ 7.5% per annum from date of claim petition till realization. (Punjab and Haryana High Court)  

A power of attorney holder cannot depose on behalf of the plain-tiff regarding readiness and willingness.

Specific Performance - Readiness and will-ingness to perform the contract must be proved by the plaintiff. A power of attorney holder cannot depose on behalf of the plain-tiff regarding readiness and willingness. Sub-sequent purchasers who act in good faith and without notice of a prior agreement to sell are bona fide purchasers.

Monday, October 19, 2026

Matters remanded for fresh adjudication in the interest of substantial justice



Income Tax - Ex parte dismissal of appeals by CIT(A) confirming large additions/estimated profit without proper examination of assessee's explanation and documents - Matters remanded for fresh adjudication in the interest of substantial justice - In one appeal, remand made subject to payment of costs of Rs. 10,000/- to Prime Minister's National Relief Fund due to assessee's negligence and non-compliance. (Income Tax Appellate Tribunal)  LAWMAN Times

क्रिमिनल प्रोसीजर - सेशन केस और कंप्लेंट केस को एक साथ करना / मिलाना - अलग ट्रायल का नियम है - जॉइंट ट्रायल अपनी मर्ज़ी से और तभी हो सकता है जब जुर्म एक ही ट्रांज़ैक्शन का हिस्सा हों या कानूनी शर्तें पूरी हों - जहाँ FIR केस और कंप्लेंट केस अलग-अलग घरों पर हुए हमलों से जुड़े हों, जिनमें अलग-अलग आरोपी/पीड़ित हों और एक सेशन ट्रायल के लायक हो जबकि दूसरा कंप्लेंट केस हो, तो एक साथ करना गलत माना गया। (सुप्रीम कोर्ट)

Sunday, October 18, 2026

CrPC की धारा 125(3) के तहत मेंटेनेंस ऑर्डर का पालन न करने पर ज़्यादा से ज़्यादा एक महीने की जेल हो सकती है; ट्रायल कोर्ट पति को लगातार जेल में नहीं रख सकता: झारखंड हाई कोर्ट


झारखंड हाई कोर्ट ने माना है कि कोड ऑफ़ क्रिमिनल प्रोसीजर (CrPC) के सेक्शन 125(3) के तहत मेंटेनेंस ऑर्डर न मानने पर ज़्यादा से ज़्यादा एक महीने की जेल हो सकती है, और ट्रायल कोर्ट इस प्रोविज़न के तहत पति को लगातार जेल में नहीं रख सकता। हाई कोर्ट, प्रिंसिपल जज, फ़ैमिली कोर्ट, दुमका के उस ऑर्डर के ख़िलाफ़ क्रिमिनल अपील पर विचार कर रहा था, जिसमें एक आदमी की अर्ज़ी खारिज कर दी गई थी, जिसमें उसने अपनी पत्नी को महीने का मेंटेनेंस न देने की वजह से लगी सिविल जेल से रिहाई की मांग की थी।  जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की सिंगल बेंच ने कहा, "ऊपर दी गई बातों को देखते हुए, ट्रायल कोर्ट कानूनी सीमाओं और उपाय के प्रकार पर ध्यान दिए बिना, Cr.P.C. की धारा 125(3) के तहत महीने का गुज़ारा भत्ता न देने पर पति को लगातार जेल में नहीं रख सकता। Cr.P.C. की धारा 125(3) के तहत जेल, गुज़ारा भत्ता ऑर्डर लागू करने का एक तरीका है और इससे जुड़ी ज़िम्मेदारी खत्म नहीं होती, लेकिन एक ही गलती के लिए लगातार सज़ा नहीं दी जा सकती, और गुज़ारा भत्ता ऑर्डर न मानने पर हर गलती पर ज़्यादा से ज़्यादा एक महीने की जेल हो सकती है।"

Saturday, October 17, 2026

नाबालिग बच्चे की अभिरक्षा - पिता की मृत्यु के बाद माता एकमात्र प्राकृतिक अभिभावक - अन्य रिश्तेदारों पर अभिरक्षा का अधिकार


(i) हिंदू अल्पसंख्यक एवं संरक्षकता अधिनियम, 1956, धारा 6(क) - नाबालिग बच्चे की अभिरक्षा - पिता की मृत्यु के बाद माता एकमात्र प्राकृतिक अभिभावक - इस धारा में प्रयुक्त शब्द "पिता की मृत्यु के बाद" का अर्थ "पिता की अनुपस्थिति में" समझा जाएगा - जहां पिता की मृत्यु हो चुकी है, वहां माता अन्य रिश्तेदारों की अपेक्षा नाबालिग बच्चे की अभिरक्षा की एकमात्र प्राकृतिक अभिभावक हैं।
(ii) संरक्षक एवं आश्रित अधिनियम, 1890, धारा 7 - नाबालिग बच्चे की अभिरक्षा - समझौता या वसीयत द्वारा प्राकृतिक अभिभावक का अधिकार समाप्त करना - कोई समझौता प्राकृतिक अभिभावक को बच्चे की अभिरक्षा के दावे से वंचित नहीं कर सकता, न ही किसी प्राकृतिक अभिभावक द्वारा निष्पादित वसीयत जीवित प्राकृतिक अभिभावक के अधिकारों को छोड़कर किसी अन्य परिवार के सदस्य को अभिरक्षा प्रदान कर सकती है।
(iii) अभिभावक एवं आश्रित अधिनियम, 1890, धारा 17 - नाबालिग बच्चे की अभिरक्षा - कम उम्र के बच्चे द्वारा व्यक्त की गई प्राथमिकता - कम उम्र का बच्चा समझदारी से अपनी प्राथमिकता व्यक्त करने में सक्षम नहीं होता है - ऐसी प्राथमिकता, विशेषकर जहाँ शिक्षण की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है, अभिरक्षा निर्धारित करने में अधिक महत्व नहीं रखती है, और प्राकृतिक अभिभावक के अधिमान्य अधिकार को समाप्त करने का औचित्य नहीं है।
(iv) अभिभावक एवं आश्रित अधिनियम, 1890, धारा 17 - नाबालिग बच्चे की अभिरक्षा - माता और रिश्तेदार के बीच वित्तीय तुलना - केवल वित्तीय निर्भरता या तुलनात्मक वित्तीय स्थिति किसी माता को प्राकृतिक अभिभावक के रूप में अभिरक्षा के उसके अधिमान्य अधिकार से वंचित नहीं कर सकती है, विशेषकर जहाँ उसके पास पर्याप्त वित्तीय संपत्ति हो।

Friday, October 16, 2026

भरण-पोषण निष्पादन वाद 6 माह में नहीं निपटाना अवमानना, इलाहाबाद HC का UP के सभी फैमिली कोर्ट को महत्वपूर्ण निर्देश


इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यूपी के सभी फैमिली कोर्ट को भरण-पोषण निष्पादन वाद छह माह में निपटाने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि ऐसा न करने पर इसे सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालय की अवमानना माना जाएगा।

कोर्ट ने कहा कि सभी ट्रायल कोर्ट सुप्रीम कोर्ट और महानिबंधक के निर्देशों का कड़ाई से पालन करें

परिवार न्यायालय कासगंज के आदेश को चुनौती देने वाली पुनरीक्षण याचिका हाई कोर्ट में खारिज। 

 इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रदेश के सभी परिवार न्यायालयों (फैमिली कोर्ट) को निर्देश दिया है कि वह भरण-पोषण के निष्पादन वादों का निपटारा छह महीने के भीतर हर हाल में करें। कोर्ट के अनुसार ऐसा नहीं करना सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालय की अवमानना माना जाएगा। न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि की एकलपीठ ने कासगंज निवासी दाता राम की पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए यह अहम निर्देश दिया है।

कोर्ट ने कहा, सुप्रीम कोर्ट ने पेरियाम्मल बनाम वी. राजामणि (2025) और राहुल एस. शाह बनाम जिनेंद्र कुमार गांधी (2021) मामले में स्पष्ट किया है कि निष्पादन याचिकाएं दाखिल होने से छह माह में निपटाई जाएं। शीर्ष अदालत ने विलंब पर चिंता जताई थी। इसके अनुपालन में हाई कोर्ट के महानिबंधक ने 24 मई 2025 को परिपत्र जारी किया। इसके तहत सभी जिला जज, प्रधान न्यायाधीश परिवार न्यायालय, कमर्शियल कोर्ट, मोटर दावा दुर्घटना अधिकरण (एमएसीटी), भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन प्राधिकरण (एलएआरआरए) के पीठासीन अधिकारियों को चेताया था कि छह माह में निष्पादन न होने पर संबंधित अधिकारी हाई कोर्ट के प्रशासनिक पक्ष के प्रति जवाबदेह होंगे।

Motor accident claim Compensation Increased

Motor Vehicles Act - Death claim - Enhancement of compensation - Deceased aged 23 years working as Security Guard - Claimants he...