Sunday, February 1, 2026

जनहित याचिका

जनहित याचिका या पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PIL) भारत में एक अनोखा कानूनी तरीका है जो किसी भी नागरिक या संगठन को उन लोगों की ओर से न्याय मांगने के लिए अदालतों में जाने की अनुमति देता है जो अक्सर गरीबी, अज्ञानता या सामाजिक नुकसान के कारण ऐसा नहीं कर सकते ।

1970 के दशक के आखिर और 1980 के दशक की शुरुआत में, मुख्य रूप से जस्टिस पी.एन. भगवती और जस्टिस वी.आर. कृष्णा अय्यर के प्रयासों से इसे पेश किया गया था, इसने लोकस स्टैंडी के पारंपरिक नियम (जो आमतौर पर केवल पीड़ित पक्ष को ही केस फाइल करने की अनुमति देता है) में ढील देकर भारतीय कानूनी परिदृश्य को मौलिक रूप से बदल दिया।

 संवैधानिक आधार

PIL दोनों में से किसी न्यायालय में योजित की जा सकती है:
सुप्रीम कोर्ट: संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत।
हाई कोर्ट: संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत।
हालांकि PIL को किसी खास कानून में परिभाषित नहीं किया गया है, लेकिन वे कोर्ट की न्यायिक समीक्षा की शक्ति और संविधान के भाग III में दिए गए मौलिक अधिकारों की रक्षा करने के उसके कर्तव्य का विस्तार हैं।
 PIL कौन  फाइल कर सकता है?
जनहितैषी नागरिक: कोई भी व्यक्ति जो जनता के भले के लिए नेक इरादे से काम कर रहा हो।
NGO और सामाजिक समूह: हाशिए पर पड़े समुदायों की ओर से काम करने वाले संगठन।
खुद कोर्ट (स्वतः संज्ञान): कोर्ट मीडिया रिपोर्टों या नागरिकों से मिले पत्रों के आधार पर खुद किसी मुद्दे पर संज्ञान ले सकता है।
स्मरण रहे- जनहित याचिका जनसमुदाय के लाभ के लिए फाइल की जानी चाहिए, न कि निजी फायदे, राजनीतिक मकसद या फालतू कारणों से (जिन्हें अक्सर कोर्ट "पर्सनल" या "पॉलिटिकल" इंटरेस्ट लिटिगेशन कहते हैं), कोर्ट ने यदि ऐसा पाया तो कोर्ट जुर्माना भी लगा देती है।

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