Tuesday, August 4, 2026

हस्तलेख परीक्षण के लिये मूल दस्तावेज आवश्यक - इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला देते हुए कहा दस्तावेज़ की केवल फोटो-कॉपी होने पर हस्ताक्षरों की फोरेंसिक अथवा हस्तलेखन विशेषज्ञ जांच नहीं कराई जा सकती है। दस्तावेज़ की केवल फोटो-कॉपी होने पर हस्ताक्षरों की फोरेंसिक अथवा हस्तलेखन विशेषज्ञ जांच नहीं कराई जा सकती क्योंकि फोटोकॉपी में लिखावट का दबाव और स्याही का प्रवाह गायब हो जाता है, जिससे वैज्ञानिक राय देना असंभव है। एटा (उत्तर प्रदेश) में एक दुकान से किरायेदार की बेदखली की कार्यवाही चल रही थी।

किरायेदार ने अपने बचाव में वर्ष 2005 के किरायानामे की फोटो-कॉपी पेश की और कहा कि मूल प्रति मकान मालिक के पास है। उसने कोर्ट से गुहार लगाई कि फोटो-कॉपी पर मौजूद मकान मालिक के कथित हस्ताक्षरों की जांच हस्तलेखन विशेषज्ञ से कराई जाए।

किराया प्राधिकरण और किराया अधिकरण दोनों ने इस अर्ज़ी को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि मूल दस्तावेज़ के बिना केवल फोटो-कॉपी पर फोरेंसिक जांच का कोई कानूनी औचित्य नहीं है। इसके खिलाफ किरायेदार हाईकोर्ट पहुँचा। न्यायमूर्ति योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने याचिका खारिज करते हुए मुख्य कानूनी व वैज्ञानिक सिद्धांत देते हुए कहा कि फोटोकॉपी में वैज्ञानिक गुणों का अभाव रहता है। कोर्ट ने आगे कहा कि फोरेंसिक विशेषज्ञ केवल अक्षरों का बाहरी आकार नहीं देखता, बल्कि लिखावट की गति, दबाव स्याही का प्रवाह और कलम उठाने के तरीके की जांच करता है। फोटोकॉपी में धुंधलापन, विकृति, छाया और दबाव गायब हो जाते हैं। कोर्ट ने किरायेदार की इस दलील को खारिज कर दिया कि मकान मालिक के बयान/स्वीकारोक्ति के आधार पर जांच होनी चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी स्वीकारोक्ति इस मूल आवश्यकता को खत्म नहीं कर सकती कि फोरेंसिक जांच के लिए भेजी जाने वाली सामग्री विश्वसनीय वैज्ञानिक परीक्षण के योग्य हो। हाईकोर्ट ने साफ किया कि याचिकाकर्ता मूल दस्तावेज़ न होने पर अन्य स्वीकार्य साक्ष्यों जैसे किराया रसीदें या मौखिक गवाही के आधार पर अपना पक्ष साबित करने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन फोटोकॉपी को विशेषज्ञ जांच के लिए नहीं भेजा जा सकता।

Sunday, August 2, 2026

पत्नी के गैर वैवाहिक सबन्ध होने पर गुजारा भत्ता नहीं- सुप्रीम कोर्ट

पति यदि शुरुआती चरण में ही ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर पत्नी के व्यभिचार  को प्रथमदृष्टया साबित कर देता है, तो दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125(4) के तहत पत्नी को अंतरिम गुज़ारा-भत्ता देने से इनकार किया जा सकता है। यह महत्वपूर्ण टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने अपने हालिया फैसले में की।

मामले में पति ने दावा किया कि पत्नी के एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर के कारण वह धारा 125(4)दंड प्रक्रिया संहिता के तहत किसी भी प्रकार के गुज़ारा-भत्ते की हकदार नहीं है और इसके समर्थन में तस्वीरें एवं अन्य साक्ष्य भी पेश किए। हालांकि, ट्रायल कोर्ट और बाद में हाईकोर्ट ने यह कहते हुए पति की आपत्ति खारिज कर दी कि ऐसे मुद्दे पर विचार केवल अंतिम सुनवाई के समय किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों अदालतों के आदेशों को रद्द करते हुए कहा कि यदि पति प्रारंभिक स्तर पर ही पर्याप्त साक्ष्यों से अपना दावा प्रथमदृष्टया स्थापित कर देता है, तो अदालत अंतरिम गुज़ारा-भत्ते पर निर्णय लेते समय धारा 125(4) की आपत्ति पर भी विचार कर सकती है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि निचली अदालतों का यह मानना कि ऐसे प्रश्न पर केवल अंतिम निर्णय के समय ही विचार किया जा सकता है, कानून के उद्देश्य के विपरीत है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को पुनः ट्रायल कोर्ट भेज दिया ताकि पति की आपत्ति पर गुण-दोष के आधार पर निर्णय लिया जा सके।

हस्तलेख परीक्षण के लिये मूल दस्तावेज आवश्यक - इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला देते हुए कहा दस्तावेज़ की केवल फोटो-कॉपी होने पर हस्ताक्षरों की फोरेंसिक अथवा हस्तलेखन विशेष...