Monday, August 31, 2026

केवल धनराशि मिलना ही रिश्वत लेने आधार नहीं माना जा सकता- सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया कि यदि अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहता है, तो केवल कथित रिश्वत की रकम बरामद होने के आधार पर आरोपी की दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती।

जस्टिस उज्ज्वल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने गुजरात हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें ग्राम पंचायत के पूर्व तलाटी-सह-मंत्री और चपरासी की दोषसिद्धि बरकरार रखी गई थी। मामला आय प्रमाण पत्र जारी करने के बदले ₹120 की कथित रिश्वत मांगने से संबंधित था। एंटी-करप्शन ब्यूरो द्वारा बिछाए गए ट्रैप में चपरासी के पास से 20 रुपए का कथित रिश्वत का नोट बरामद हुआ था।

सुप्रीम कोर्ट ने साक्ष्यों का विश्लेषण करते हुए पाया कि शिकायतकर्ता के बयानों में महत्वपूर्ण विरोधाभास थे। कथित रूप से 120 रुपए की मांग तलाटी-सह-मंत्री द्वारा की गई थी, लेकिन उसके पास से कोई रकम बरामद नहीं हुई, जबकि चपरासी के पास 20 रुपए का नोट मिला, जिसके द्वारा रिश्वत मांगने का कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि एंटी-करप्शन ब्यूरो ने शिकायतकर्ता को मांग किए जाने पर पूरी 120 रुपये की रकम देने का निर्देश दिया था, लेकिन आय प्रमाण पत्र जारी होने के बाद शिकायतकर्ता ने केवल 20 रुपए चपरासी को दिए। इस परिस्थिति का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण भी अभियोजन पक्ष नहीं दे सका।

पीठ ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 20 के तहत वैधानिक अनुमान तभी लागू हो सकता है जब अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग को पहले विश्वसनीय रूप से साबित कर दे। यदि शुरुआती मांग ही साबित नहीं होती है, तो केवल आरोपी के पास से 20 रुपए की बरामदगी अभियोजन के मामले को दोबारा मजबूत नहीं कर सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने N. Vijayakumar v. State of Tamil Nadu के फैसले का हवाला देते हुए यह भी स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती कि आरोपी सरकारी कर्मचारी था और उसके पास से “tainted money” बरामद हुआ था। कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि दोनों आरोपियों को आपराधिक साजिश के आरोप से बरी किया गया था।

इसके अतिरिक्त, पीठ ने तलाटी-सह-मंत्री के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी पर भी सवाल उठाया और पाया कि डिप्टी डिस्ट्रिक्ट डेवलपमेंट ऑफिसर द्वारा दी गई मंजूरी वैध नहीं थी, क्योंकि अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि संबंधित अधिकारी के पास ऐसी मंजूरी देने का अधिकार था। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोषसिद्धि को केवल मंजूरी की इस कमी के आधार पर नहीं, बल्कि अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों द्वारा आरोपों को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहने के आधार पर रद्द किया जा रहा है।

फैसले में चपरासी द्वारा 20 रुपए मिलने के संबंध में दिए गए बचाव को भी परिस्थितियों के अनुसार संभावित माना गया। अंततः सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और गुजरात हाईकोर्ट के फैसलों को रद्द करते हुए दोनों अपीलकर्ताओं को बरी कर दिया।


Monday, August 24, 2026

फुटपाथों को कब्जा मुक्त कराने के लिये निर्देश जारी

सुप्रीम कोर्ट ने फुटपाथ की अहमियत को रेखांकित करते हुए सोमवार को कहा कि फुटपाथ मानव जीवन का अहम हिस्सा है। पैदल चलने वालों के सुरक्षित आवागमन के अधिकार को गंभीरता से लेते हुए शीर्ष अदालत ने सभी राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों से जवाब मांगा है कि सड़कों पर पैदल यात्रियों के लिए सही ढंग से चिन्हित और कब्जा मुक्त फुटपाथ सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाये गए हैं।

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और आलोक अराधे की पीठ ने सड़क पर पैदल चलने वालों के लिए तय और सुरक्षित स्थान सुनिश्चित करने से जुड़े मामले का दायरा बढ़ाते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पक्षकार बनाया है। कोर्ट ने केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सालिसिटर जनरल (एएसजी) केएम नटराज से कहा कि पहला कदम पैदल चलने वालों के लिए जगह को सही ढंग से चिन्हित करना है। लोगों को यह भरोसा होना चाहिए कि सड़क पर उनके लिए सुरक्षित जगह मौजूद है और उन्हें उसी जगह पर चलना है। केंद्र सरकार की ओर से पेश एएसजी ने कोर्ट को बताया कि सड़कें राज्य का विषय हैं, इसके बावजूद सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय, आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ ही भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआइ) को पैदल चलने वालों के लिए अलग जगह उपलब्ध कराने (फुटपाथ) संबंधी एडवाइजरी जारी की है।
स्रोत-जागरण

Tuesday, August 4, 2026

हस्तलेख परीक्षण के लिये मूल दस्तावेज आवश्यक - इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला देते हुए कहा दस्तावेज़ की केवल फोटो-कॉपी होने पर हस्ताक्षरों की फोरेंसिक अथवा हस्तलेखन विशेषज्ञ जांच नहीं कराई जा सकती है। दस्तावेज़ की केवल फोटो-कॉपी होने पर हस्ताक्षरों की फोरेंसिक अथवा हस्तलेखन विशेषज्ञ जांच नहीं कराई जा सकती क्योंकि फोटोकॉपी में लिखावट का दबाव और स्याही का प्रवाह गायब हो जाता है, जिससे वैज्ञानिक राय देना असंभव है। एटा (उत्तर प्रदेश) में एक दुकान से किरायेदार की बेदखली की कार्यवाही चल रही थी।

किरायेदार ने अपने बचाव में वर्ष 2005 के किरायानामे की फोटो-कॉपी पेश की और कहा कि मूल प्रति मकान मालिक के पास है। उसने कोर्ट से गुहार लगाई कि फोटो-कॉपी पर मौजूद मकान मालिक के कथित हस्ताक्षरों की जांच हस्तलेखन विशेषज्ञ से कराई जाए।

किराया प्राधिकरण और किराया अधिकरण दोनों ने इस अर्ज़ी को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि मूल दस्तावेज़ के बिना केवल फोटो-कॉपी पर फोरेंसिक जांच का कोई कानूनी औचित्य नहीं है। इसके खिलाफ किरायेदार हाईकोर्ट पहुँचा। न्यायमूर्ति योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने याचिका खारिज करते हुए मुख्य कानूनी व वैज्ञानिक सिद्धांत देते हुए कहा कि फोटोकॉपी में वैज्ञानिक गुणों का अभाव रहता है। कोर्ट ने आगे कहा कि फोरेंसिक विशेषज्ञ केवल अक्षरों का बाहरी आकार नहीं देखता, बल्कि लिखावट की गति, दबाव स्याही का प्रवाह और कलम उठाने के तरीके की जांच करता है। फोटोकॉपी में धुंधलापन, विकृति, छाया और दबाव गायब हो जाते हैं। कोर्ट ने किरायेदार की इस दलील को खारिज कर दिया कि मकान मालिक के बयान/स्वीकारोक्ति के आधार पर जांच होनी चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी स्वीकारोक्ति इस मूल आवश्यकता को खत्म नहीं कर सकती कि फोरेंसिक जांच के लिए भेजी जाने वाली सामग्री विश्वसनीय वैज्ञानिक परीक्षण के योग्य हो। हाईकोर्ट ने साफ किया कि याचिकाकर्ता मूल दस्तावेज़ न होने पर अन्य स्वीकार्य साक्ष्यों जैसे किराया रसीदें या मौखिक गवाही के आधार पर अपना पक्ष साबित करने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन फोटोकॉपी को विशेषज्ञ जांच के लिए नहीं भेजा जा सकता।

Sunday, August 2, 2026

पत्नी के गैर वैवाहिक सबन्ध होने पर गुजारा भत्ता नहीं- सुप्रीम कोर्ट

पति यदि शुरुआती चरण में ही ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर पत्नी के व्यभिचार  को प्रथमदृष्टया साबित कर देता है, तो दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125(4) के तहत पत्नी को अंतरिम गुज़ारा-भत्ता देने से इनकार किया जा सकता है। यह महत्वपूर्ण टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने अपने हालिया फैसले में की।

मामले में पति ने दावा किया कि पत्नी के एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर के कारण वह धारा 125(4)दंड प्रक्रिया संहिता के तहत किसी भी प्रकार के गुज़ारा-भत्ते की हकदार नहीं है और इसके समर्थन में तस्वीरें एवं अन्य साक्ष्य भी पेश किए। हालांकि, ट्रायल कोर्ट और बाद में हाईकोर्ट ने यह कहते हुए पति की आपत्ति खारिज कर दी कि ऐसे मुद्दे पर विचार केवल अंतिम सुनवाई के समय किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों अदालतों के आदेशों को रद्द करते हुए कहा कि यदि पति प्रारंभिक स्तर पर ही पर्याप्त साक्ष्यों से अपना दावा प्रथमदृष्टया स्थापित कर देता है, तो अदालत अंतरिम गुज़ारा-भत्ते पर निर्णय लेते समय धारा 125(4) की आपत्ति पर भी विचार कर सकती है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि निचली अदालतों का यह मानना कि ऐसे प्रश्न पर केवल अंतिम निर्णय के समय ही विचार किया जा सकता है, कानून के उद्देश्य के विपरीत है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को पुनः ट्रायल कोर्ट भेज दिया ताकि पति की आपत्ति पर गुण-दोष के आधार पर निर्णय लिया जा सके।

Trial court need not hold a mini-trial at the stage of granting an ex parte ad interim injunction- Calcutta High Court

Injunction - **Ex parte ad interim injunction** granted by the trial court - Found to be based on relevant materials and pleadings on oath -...