Tuesday, June 23, 2026

सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस द्वारा व्यक्ति को हिरासत में रखने पर 10 लाख रुपये अदा करने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर लगाई रोक

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (22 जून) को इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें राज्य सरकार को एक व्यक्ति को गैर-कानूनी गिरफ्तारी के बाद तीन महीने से ज़्यादा समय तक गैर-कानूनी हिरासत में रखने के लिए 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच, हाई कोर्ट द्वारा रेस्पोंडेंट को दिए गए मुआवजे की रकम के सीमित मुद्दे पर हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली राज्य की अपील पर सुनवाई कर रही थी।

राज्य ने मुआवजे की रकम के खिलाफ दलील दी, साथ ही रेस्पोंडेंट को गिरफ्तारी के आधार न बताए जाने को भी माना। इसने कोर्ट को बताया कि संबंधित स्टेशन हाउस ऑफिसर (SHO) के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू कर दी गई है, जिन्हें तब से सस्पेंड कर दिया गया है।

राज्य के वकील की दलील के बाद, बेंच ने रेस्पोंडेंट को मुआवजे के भुगतान के संबंध में एक नोटिस जारी किया और अंतरिम रोक का आदेश दिया।  अदालत ने कहा, "नोटिस जारी करें। इस बीच, जहां तक ​​याचिकाकर्ता पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाने से संबंधित आदेश है, उस पर अगली सुनवाई तक रोक लगी रहेगी।"

Monday, June 22, 2026

शादी का वादा करके सिर्फ़ शारीरिक संबंध बनाना हर बार रेप नहीं होता: बॉम्बे हाइकोर्ट ने टूर मैनेजर के ख़िलाफ़ प्राथमिकी रद्द की

जस्टिस रंजीतसिंह राजा भोंसले की बेंच ने कहा, "रेस्पोंडेंट नंबर 2 का बर्ताव उसके पूरे केस को शक के दायरे में लाता है। यह बात पक्की है कि झूठे वादे के मामले में, आरोपी का शुरू से ही शिकायत करने वाली से शादी करने का कोई इरादा नहीं होना चाहिए था और उसने सिर्फ़ अपनी ज़रूरत/हवस पूरी करने के लिए शिकायत करने वाली से शादी का झूठा वादा करके उसे धोखा दिया होगा। जबकि शादी का वादा तोड़ने के मामले में, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आरोपी ने पूरी गंभीरता से उससे शादी करने का वादा किया होगा और बाद में उसके कंट्रोल से बाहर कुछ ऐसे हालात आ गए होंगे जिनकी वजह से वह अपना वादा पूरा नहीं कर पाया। यह मान भी लें कि FIR में लगाए गए आरोप सही हैं, तो भी यह ध्यान रखना होगा कि सिर्फ़ यह बात कि दोनों पार्टियां शादी के वादे के तहत फिजिकल रिलेशनशिप बनाती हैं, हर मामले में रेप नहीं होगी और न ही हो सकती है।"

बार एसोसिएशन को वकीलों के प्रैक्टिस करने के अधिकार पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई नियामक नियंत्रण नहीं दिया जा सकता- तेलंगाना हाई कोर्ट

एक महत्वपूर्ण फैसले में तेलंगाना हाईकोर्ट की जस्टिस एन. तुकारामजी की सिंगल जज बेंच ने स्पष्ट किया है कि वकीलों के लिए बार एसोसिएशन की सदस्यता अनिवार्य नहीं बनाई जा सकती और केवल सदस्यता न लेने के आधार पर किसी अधिवक्ता को कानून की प्रैक्टिस करने से रोका या अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। यह फैसला विजय गोपाल बनाम बार कौंसिल ऑफ इंडिया व अन्य मामले में दिया गया।

कोर्ट ने 'Bar Council of India Certificate and Place of Practice (Verification) Rules, 2015' के नियम 6 की सीमित व्याख्या करते हुए कहा कि इस प्रावधान को इस प्रकार लागू नहीं किया जा सकता कि बार एसोसिएशन की सदस्यता अनिवार्य हो जाए या वकीलों के प्रैक्टिस करने के अधिकार पर गैर-वैधानिक संस्थाओं का नियंत्रण स्थापित हो। अदालत ने कहा कि ऐसी कोई भी व्याख्या Advocates Act, 1961 की सीमाओं से बाहर होगी और संविधान के अनुच्छेद 19(1)(c) तथा 19(1)(g) के तहत प्राप्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन मानी जाएगी।

यह मामला अधिवक्ता विजय गोपाल द्वारा दायर याचिका से संबंधित था, जिसमें नियम 6 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए कहा गया था कि नामांकित अधिवक्ता को अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 22, 30 और 33 के तहत प्राप्त प्रैक्टिस के वैधानिक अधिकार को किसी बार एसोसिएशन की सदस्यता से नहीं जोड़ा जा सकता। याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया था कि किसी संगठन की सदस्यता के लिए बाध्य करना संविधान द्वारा प्रदत्त संघ बनाने या न बनाने की स्वतंत्रता का अतिक्रमण है।

सुनवाई के दौरान बार काउंसिल ऑफ इंडिया और तेलंगाना बार काउंसिल ने कहा कि नियम 6 का उद्देश्य वास्तविक अधिवक्ताओं की पहचान करना तथा कल्याणकारी योजनाओं का लाभ सुनिश्चित करना है। कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि नियम 6 केवल एक विकल्प प्रदान करता है और इसे अनिवार्य सदस्यता के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बार एसोसिएशन को वकीलों के प्रैक्टिस करने के अधिकार पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई नियामक नियंत्रण नहीं दिया जा सकता।

इसके साथ ही कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को निर्देश दिया कि वह सभी राज्य बार काउंसिलों को उचित स्पष्टीकरण जारी करे, ताकि प्रमाणन और सत्यापन की प्रक्रिया केवल कल्याणकारी और प्रशासनिक उद्देश्यों तक सीमित रहे तथा इसे वकालत के अधिकार पर बाध्यकारी शर्त के रूप में लागू नहीं किया जाए।

Sunday, June 21, 2026

बच्चे को सिखाये जाने की संभावना के आधार पर बच्चे की गवाही खारिज नहीं की जा सकती: दिल्ली हाई कोर्ट ने स्कूल कैब ड्राइवर की POCSO सज़ा को बरकरार रखा

दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस एक्ट, 2012 के तहत चार साल की बच्ची पर गंभीर पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट के लिए एक स्कूल कैब ड्राइवर की सज़ा को सही ठहराया है। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई बच्चा गवाह लंबे समय बाद भी कोर्ट में आरोपी की पहचान नहीं कर पाता है, तो इससे प्रॉसिक्यूशन का केस खत्म नहीं होता, बशर्ते रिकॉर्ड में मौजूद दूसरे सबूतों से पहचान अलग से और पक्के तौर पर साबित हो जाए। कोर्ट ने आगे कहा कि ट्रायल कोर्ट का यह न बताना कि एक ही लेन-देन से जुड़े कई अपराधों के लिए दी गई सज़ाएँ एक साथ चलेंगी या एक के बाद एक, न्यायिक अधिकार का गलत इस्तेमाल है, जिसे सिर्फ़ जेल अधिकारियों के फ़ैसले पर नहीं छोड़ा जा सकता, और इस मामले में पंद्रह साल की कुल एक के बाद एक सज़ाएँ CrPC के सेक्शन 31 के नियम का उल्लंघन करेंगी।

Friday, June 19, 2026

युवा और प्रतिभाशाली वकील आर्थिक तंगी से पेशा छोड़ रहे हैं, अदालत परिसर में महिला वकीलों की सुरक्षा व आराम के लिए आग्रह किया सुप्रीम कोर्ट ने

 सुप्रीम कोर्ट ने "युवा वकीलों के पेशेवर सहायता कोष" की स्थापना की आवश्यकता पर बल दिया ताकि इस पेशे से "ब्रेन ड्रेन" को रोका जा सके। सर्वोच्च अदालत का कहना है कि युवा और प्रतिभाशाली वकील वित्तीय कठिनाइयों के कारण पेशे को छोड़ रहे हैं। अपर न्यायालय ने महिला वकीलों द्वारा सामना की जाने वाली समस्याओं पर भी ध्यान दिया और कहा कि जब उन्हें अपने दिन का बड़ा हिस्सा अदालत परिसर में बिताना पड़ता है, तो उनके आराम, गोपनीयता, सुरक्षा और पेशेवर कार्यप्रणाली के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे की उपलब्धता अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। अदालत ने सभी पक्षों से इन विषयों पर गंभीरता से अपनी राय देने को कहा है। इस मामले में अगली सुनवाई 17 जुलाई को होगी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने शुक्रवार को केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी किया, जिसमें युवा वकीलों द्वारा पेशे के प्रारंभिक वर्षों में सामना की जाने वाली वित्तीय चुनौतियों पर याचिका के जवाब मांगे गए। महिला वकीलों के एक समूह द्वारा दायर याचिका ने कानूनी पेशे में महिला वकीलों की पहुंच, समावेशिता और दीर्घकालिक स्थिरता के मुद्दों को भी उठाया और कहा- युवा और प्रतिभाशाली वकील आर्थिक तंगी से पेशा छोड़ रहे हैं।
पीठ ने कहा कि युवा वकीलों द्वारा सामना की जाने वाली वित्तीय चुनौतियां पुरुषों व महिलाओं दोनों को ही समान रूप से हैं और इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। इस प्रारंभिक अवधि में कई जूनियर वकील अपने सीनियर्स द्वारा दिए गए मामूली भत्तों पर निर्भर रहते हैं, जो अक्सर उनके बुनियादी जीवन व्यय को पूरा करने के लिए अपर्याप्त होते हैं। न्यायालय ने कहा कि इन वर्षों में सीमित पारिश्रमिक अत्यधिक वित्तीय कठिनाई पैदा करता है। इस प्रकार की कमी पेशेवर ब्रेन ड्रेन का रूप ले सकती है, जो बार के युवा और योग्य वकीलों को आकर्षित करने और बनाए रखने की क्षमता को कम करती है।" पीठ ने कहा, "युवा वकीलों का 'पेशेवर सहायता कोष' स्थापित किया जाना चाहिए।

Motor accident claim Compensation Increased

Motor Vehicles Act - Death claim - Enhancement of compensation - Deceased aged 23 years working as Security Guard - Claimants he...