Saturday, July 25, 2026

मेंटेनेंस ऑर्डर लागू न करने पर कंटेम्प्ट प्रोसीडिंग्स हो सकती हैं: HC ने फैमिली कोर्ट के जजों को चेतावनी दी

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माना कि पारिवारिक न्यायालय भरण पोषण दावेदारों को मासिक भरण पोषण आदेशों को लागू करने के लिए लगातार निष्पादन आवेदन दायर करने के लिए मजबूर नहीं कर सकते हैं और ऐसे आदेशों के निष्पादन को नियंत्रित करने वाले कानून का कड़ाई से पालन करने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने धारा 125 सीआरपीसी / धारा 144 बीएनएसएस के तहत भरण पोषणआदेश के निष्पादन से निपटने में पारिवारिक न्यायालय द्वारा अपनाए गए गलत दृष्टिकोण को खारिज कर दिया। 
न्यायालय ने यह चेतावनी देते हुए निष्कर्ष निकाला कि न्यायिक अधिकारियों द्वारा सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के बाध्यकारी निर्देशों को लागू करने में विफलता अनुशासनात्मक और अवमानना कार्यवाही को आमंत्रित कर सकती है।

Friday, July 17, 2026

फर्जी हस्ताक्षर करने के लिए याची एवं उसके अधिवक्ता के विरुद्ध कार्यवाही

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में फर्जी हस्ताक्षर और दस्तावेजों के कथित इस्तेमाल को गंभीर मानते हुए याचिकाकर्ता और उसके अधिवक्ता के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दिया है,
यह जनहित याचिका (PIL) कुशीनगर स्थित तमकुहीराज एजुकेशन सोसाइटी और फतेह मेमोरियल इंटर कॉलेज के प्रबंधक की नियुक्ति में कथित अनियमितताओं को चुनौती देने से संबंधित थी।

सुनवाई के दौरान एक प्रतिवादी ने आरोप लगाया कि याचिका वापस लेने के लिए दायर आवेदन पर उसके अधिवक्ता के फर्जी हस्ताक्षर किए गए हैं। साथ ही यह भी दावा किया गया कि याचिकाकर्ता की ओर से पेश होने वाला अधिवक्ता कथित रूप से काल्पनिक पहचान का इस्तेमाल कर रहा था और अलग-अलग तारीखों पर अलग-अलग व्यक्ति स्वयं को उसका वकील बताकर अदालत में पेश हुए।

हाईकोर्ट ने मामले की जांच के लिए दस्तावेज एफएसएल, लखनऊ भेजे। एफएसएल रिपोर्ट में विभिन्न दस्तावेजों पर किए गए हस्ताक्षरों में गंभीर विसंगतियां पाई गईं। संबंधित अधिवक्ता ने बीमारी के कारण हस्ताक्षरों में बदलाव का स्पष्टीकरण दिया, लेकिन अदालत इससे संतुष्ट नहीं हुई।

खंडपीठ ने उपलब्ध सामग्री के आधार पर प्रथम दृष्टया जालसाजी और दस्तावेजों में हेरफेर का मामला माना और BNSS की धारा 379 के तहत सक्षम मजिस्ट्रेट, प्रयागराज के समक्ष शिकायत दर्ज कर आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया। साथ ही अदालत ने कहा कि चूंकि जनहित याचिका की शुरुआत ही प्रथम दृष्टया फर्जीवाड़े से प्रभावित प्रतीत होती है, इसलिए मजिस्ट्रेट के निर्णय तक याचिका की आगे की सुनवाई स्थगित रहेगी।
Case Title: Sangeeta Gupta v. State of U.P. and 4 Others | PIL No. 450 of 2025
खंडपीठ: मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली एवं न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेन्द्र

Monday, July 13, 2026

चार्ज शीट दाखिल होने पर प्रोटेस्ट दाखिल नहीं किया जा सकता - मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस जय कुमार पिल्लई ने एक अहम निर्णय में स्पष्ट किया कि यदि जांच एजेंसी किसी मामले में आरोपपत्र (Charge Sheet) दाखिल करती है, तो आरोपी को उसके खिलाफ विरोध याचिका (Protest Petition) दायर कर आरोप तय होने से पहले अलग से सुनवाई कराने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है। ऐसी स्थिति में आरोपी के पास उपलब्ध कानूनी उपाय केवल आरोपमुक्ति (Discharge) की मांग करना है।

यह टिप्पणी उस मामले में की गई, जिसमें एक महिला ने आरोपी पर शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने का आरोप लगाया था। पुलिस ने जांच के बाद भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 के तहत आरोपपत्र दाखिल किया, जबकि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध प्रथम दृष्टया साक्ष्यों के आधार पर BNS की धारा 69 और धारा 296 के तहत आरोप तय किए।

आरोपी ने आरोपपत्र और संज्ञान आदेश को चुनौती देते हुए विरोध याचिका दायर की थी, लेकिन हाईकोर्ट ने माना कि उसके तर्क वास्तव में आरोपमुक्ति की मांग से जुड़े थे। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोप तय किया जाना इस बात का संकेत है कि आरोपमुक्ति की मांग अस्वीकार कर दी गई थी। साथ ही, विरोध याचिका पर अलग से आदेश न देने मात्र से पूरी कार्यवाही अवैध नहीं हो जाती।
वाद शीर्षक: पार्थ कुमार तिवारी बनाम मध्य प्रदेश राज्य व अन्य (Cr.R. No. 2569/2026)

Thursday, July 9, 2026

तलाक के बाद पुनर्विवाह कर लेने पर पूर्व पति से गुजारा भत्ता क्यों - इलाहाबाद हाई कोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी की पीठ ने झांसी के अतिरिक्त प्रधान जज, परिवार न्यायालय यह स्पष्ट करने को कहा है कि जब रिकॉर्ड पर यह तथ्य मौजूद था कि तलाक के बाद पत्नी ने दूसरा विवाह कर लिया है, तब भी पहले पति को पत्नी के लिए ₹10,000 प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का आदेश किस आधार पर पारित किया गया।
 मामले के अनुसार, 30 जुलाई 2025 को झांसी फैमिली कोर्ट ने पति-पत्नी के बीच तलाक की डिक्री पारित की थी। इसके लगभग एक महीने बाद पत्नी ने दूसरा विवाह कर लिया। पति का दावा है कि पत्नी ने अपने शपथपत्र में स्वयं पुनर्विवाह की जानकारी दी थी और CrPC की धारा 125 के तहत चल रही गुजारा भत्ता की कार्यवाही में उसने इस संबंध में आपत्ति भी दर्ज कराई थी। इसके बावजूद फैमिली कोर्ट ने पत्नी के लिए ₹10,000 प्रतिमाह और पुत्र के लिए ₹5,000 प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का आदेश पारित कर दिया।
 इस आदेश को चुनौती देते हुए पति ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया और कहा कि वह अपने पुत्र के भरण-पोषण की राशि देने को तैयार है तथा उसका भुगतान भी कर रहा है, लेकिन पुनर्विवाह कर चुकी पत्नी को पहले पति से गुजारा भत्ता देने का आदेश कानून के अनुरूप नहीं है। उल्लेखनीय है कि CrPC की धारा 125 के अनुसार, तलाकशुदा महिला तभी गुजारा भत्ता पाने की पात्र होती है, जब तक उसने दूसरा विवाह न किया हो।
 सुनवाई के दौरान जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी ने फैमिली कोर्ट के जज श्री हरिशचंद्र से स्पष्टीकरण मांगा है और मामले में पत्नी को नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई 21 जुलाई तय की है।

Monday, July 6, 2026

मोरमुगाओ पोर्ट से शिवाजी की प्रतिमा हटाने के बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें मोरमुगाओ पोर्ट अथॉरिटी की ज़मीन से छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा हटाने का आदेश दिया गया था।
न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति शील नागू की आंशिक बेंच हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि हाई कोर्ट ने अंतरिम चरण में ही अंतिम राहत दे दी थी।
हालांकि, बेंच की अनिच्छा को देखते हुए, याचिकाकर्ताओं ने मामला वापस लेने का विकल्प चुना और इसे वापस लिए जाने के रूप में खारिज कर दिया गया। बेंच ने याचिकाकर्ताओं को हाई कोर्ट में उचित आवेदन दायर करके अपने आदेश में बदलाव की मांग करने की स्वतंत्रता दी।
संक्षेप में, विवादित आदेश के माध्यम से, हाई कोर्ट ने पोर्ट अथॉरिटी की ज़मीन से प्रतिमा को हटाने का आदेश दिया था, यह कहते हुए कि इसे स्थानीय कानूनों का "घोर उल्लंघन" करते हुए स्थापित किया गया था और इसका निर्माण अवैध रूप से किया गया था।
 न्यायमूर्ति वाल्मीकि मेनेजेस और न्यायमूर्ति अमित जमसंदेकर की खंडपीठ ने अधिकारियों और गोवा प्रशासन को "मूक दर्शक" बने रहने और अवैध रूप से प्रतिमा स्थापित होने देने के लिए फटकार लगाई।

Transfer of Petition-- Matrimonial Suit -- Wife Living Far Away with Minor Child -- Suit transferred to court near residence of wife

Code of Civil Procedure, 1908, S.24 -- Transfer of Matrimonial Suit -- Wife Living Far Away with Minor Child -- Suit can be tran...