Monday, July 19, 2021

सूचना का अधिनियम के तहत जानकारी साझा करने के विरुद्ध एकजुट हुए बैंक

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा बैंकों के निरीक्षण के संबंध में दी जाने वाली रिपोर्ट को सूचना के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत सार्वजनिक करने के खिलाफ कई बैंक एकजुट हो गए हैं उनका तर्क है कि अपने ग्राहकों की जानकारी किसी अन्य पक्ष के साथ साझा करके हम अपने ग्राहकों के विश्वास को नहीं तोड़ सकते इस प्रकार की दलीलें भारतीय स्टेट बैंक ऐक्सिस बैंक एचडीएफसी बैंक सहित अन्य बैंकों ने भी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखी हैं एचडीएफसी बैंक और एक्सिस बैंक का कहना है कि सूचना के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत सरकारी विभाग आते हैं जबकि यह दोनों ही प्राइवेट बैंक  हैं जो कि सूचना के अधिकार अधिनियम के दायरे से बाहर हैं।

विस्थापित व्यक्ति की अपेक्षा अतिक्रमणकर्ता को खाली पड़ी भूमि के नियमितीकरण का कोई अधिकार नहीं- सर्वोच्च न्यायालय

सिविल अपील संख्या 2815 सन 2015 में निर्णय दिया गया-

विस्थापित व्यक्ति- प्रतिवादी क्रमांक 4 आवंटन का दावा कर रहा है सरकार के नीति निर्णय दिनांक 20.06.1978 के आधार पर। 
विस्थापित व्यक्ति को खाली भूमि आवंटित की जानी चाहिए क्योंकि अधिनियम की धारा 14 के अनुसार क्षतिपूर्ति का हिस्सा जिसे अधिनियम की धारा 20 के अनुसार आवंटित किया जा सकता है।
 केवल विस्थापित व्यक्ति को ही खाली भूमि आवंटित की जा सकती है। 
 गैर-विस्थापित व्यक्ति को आवंटन पर तभी विचार किया जा सकता है।
 दिनांक 20.06.1978 की नीति में अतिक्रमण करने वालों को खाली भूमि आवंटित की जाती है
 योजना और अधिनियम के उद्देश्य से परे।  हालांकि, यदि एक अतिक्रमणकर्ता को आवंटन किया गया था और प्राप्त किया था अंतिम रूप से, इसे फिर से नहीं खोला जाएगा।  इसलिए, एक विस्थापित व्यक्ति की अपेक्षा अतिक्रमणकर्ता को खाली पड़ी भूमि के नियमितीकरण का कोई अधिकार नहीं हैं। 24 जनवरी 2014 को सरकार द्वारा जमीन का कब्जा ले लिया गया है। अपीलकर्ता द्वारा यह अपील कब्जे की पुन स्थापना के लिए योजित की गई है जोकि उपरोक्त अवलोकन के अनुसार अस्वीकार्य है।
न्यायमूर्ति संजय किशन कौल
न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता
13 जुलाई 2021

विवाहित होने के कारण लिव इन रिलेशनशिप मे रहने पर सेवा से बर्खास्तगी उचित नहीं: हाई कोर्ट (प्रयागराज)

प्रयागराज  माननीय उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पंकज भाटिया ने अपने  महत्वपूर्ण  निर्णय  (दिनांक 14 जुलाई 2021) में कहा है कि किसी पुरुष के विवाहित होते हुए किसी अन्य महिला के साथ लिव इन रिलेशन में रहने वाले सरकारी कर्मचारी को सेवा से बर्खास्तगी को अनुचित बताया । कोर्ट ने माना कि सेवा से बर्खास्तगी एक कठोर दंड है।
बर्खास्तगी आदेश को निरस्त करते हुए कोर्ट ने कहा कि याची को सेवा में फिर से बहाल किया जाए और विभाग चाहे तो दूसरा मामूली दंड दे सकता है। गोरेलाल वर्मा की याचिका पर न्यायमूर्ति पंकज भाटिया ने उक्त आदेश दिया है। याचिका में कहा गया कि गोरेलाल की शादी लक्ष्मीदेवी से हुई है,जो कि जीवित है,लेकिन वह हेमलता नाम की अन्य महिला के साथ लिव इन रिलेशनशिप मे रहता है और दोनों के तीन बच्चे हैं।

इस आधार पर 31 अगस्त 2020 को उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। इस आदेश के विरूद्ध उसने विभागीय अपील की वह भी खारिज कर दी गई।

विभाग का मानना है कि उसका यह कार्य सरकारी सेवक आचरण नियमावली 1956 और हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत है। याची के वकील ने तर्क प्रस्तुत किया कि मा उच्च न्यायालय ने अनीता यादव बनाम उत्तरप्रदेश राज्य के केस में इस प्रकार के मामले में बर्खास्तगी का आदेश रद्द कर दिया था। और इस मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय में अपील होने पर भी माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने एक अन्य मामले श्रवण कुमार पांडेय बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य के निर्णय का संदर्भ लेते हुए उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया।


Saturday, July 17, 2021

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने सब इंस्पेक्टर की नियुक्ति प्रक्रिया में आवेदन की आयु सीमा का निर्धारण 1 जुलाई 2018 किये जाने का अंतरिम आदेश दिया


कोर्ट नंबर - 19

 केस:- सर्विस सिंगल नंबर - 14612/2021 

 याचिकाकर्ता :- अभिषेक मिश्रा एवं अन्य Other

 प्रतिवादी :- उत्तर प्रदेश राज्य  

 माननीय न्यायमूर्ति चंद्रधारी सिंह 

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने सब इंस्पेक्टर की नियुक्ति प्रक्रिया में आवेदन करने की आयु सीमा का निर्धारण 1 जुलाई 2018 किया जाने का अंतरिम आदेश दिया है। उक्त आदेश जस्टिस चन्द्रधारी सिंह ने अभिषेक मिश्रा व 74 अन्य याचियों की याचिका को स्वीकार करते हुए याचीगण ने हाई कोर्ट में आवेदन करने के लिए आयु सीमा में छूट दिए जाने के लिए याचिका दाखिल की थी। याचियों के पक्षकार अधिवक्ता दीपक सिंह ने बताया कि सभी याचीगण 23 मार्च 2021 के भर्ती बोर्ड के अधियाचन में तय आयु सीमा से बाहर हो रहे थे, क्योंकि भर्ती बोर्ड व शासन द्वारा 2016 के उपरांत से इंस्पेक्टर व सब इंस्पेक्टर श्रेणी की कोई भी भर्ती प्रक्रिया का अधियाचन नहीं निकाला गया।

2017 से 2021 तक के सभी पदों का एक साथ अधियाचन 23 मार्च 2021 को भर्ती बोर्ड द्वारा जारी किया गया। इस अधियाचन में आयु सीमा का निर्धारण 2021 की तत्काल नियुक्ति प्रक्रिया के हिसाब से किया गया था जबकि गृह विभाग द्वारा सुप्रीम कोर्ट में 2018 में मनीष सिंह बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के वाद में यह शपथ पत्र दिया गया था कि अगले चार वर्षों तक 3220 सब इंस्पेक्टर के पदों प्रतिवर्ष नियुक्ति के लिए अधियाचन जारी किए जाएंगे। इसके बाद भी शासन द्वारा 2016 के बाद से कोई भी सब इंस्पेक्टर की नियुक्ति प्रक्रिया नहीं जारी की गई।
बकौल अधिवक्ता चार वर्षों की नियुक्तियों को एक साथ 23-03-2021 को अधियाचन द्वारा विज्ञापित कर दिया गया और आयु सीमा निर्धारण तत्काल से रखा गया। जिसकी वजह कई अभ्यर्थी ओवर एज होने के कारण फार्म नहीं भर पा रहे थे। इसके बाद याचियों ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल की जिस पर हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए उसे स्वीकार किया व सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए समय देते हुए सभी याचियों को 15 जुलाई 2021 की अंतिम तिथि तक आवेदन करने व भर्ती बोर्ड द्वारा उक्त आवेदन को स्वीकार करने का अंतरिम आदेश पारित किया।
 राज्य को चार सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।
 प्रत्युत्तर हलफनामा, यदि कोई हो, दो सप्ताह के भीतर दाखिल किया जाए।
 07.09.2021 को सूचीबद्ध हो
 आदेश दिनांक:- 14.7.221

अधिवक्ता परिषद गाज़ियाबाद इकाई द्वारा स्वाध्याय मंडल (स्टडी सर्किल) का आयोजन किया गया।

अधिवक्ता परिषद उत्तर प्रदेश गाज़ियाबाद इकाई 
 द्वारा दिनांक 16 जुलाई 2021 शुक्रवार को स्वाध्याय मंडल बैठक का आयोजन किया गया। उपस्थित अधिवक्ताओं को मुख्य वक्ता श्री सुनील तिवारी जी 
ने संबोधित करते हुए एडवोकेट एक्ट(नवीन संशोधन) बिषय पर प्रकाश डाला।
स्वाध्याय मंडल का आयोजन बार सभागार में कोविड नियमो का पालन करते हुए किया गया।

Friday, July 16, 2021

आगामी मानसून सत्र में नए विधेयक लाएगी केंद्र सरकार

केंद्र सरकार 19 जुलाई से शुरू होने जा रहे मानसून सत्र में 15 नए विधेयक संसद में सदन की मंजूरी के लिये लाने जा रही है । जिनमें समान नागरिक संहिता को संसद के पटल पर विशेष रूप से रखे जाने की उम्मीद है। यह सत्र 19 जुलाई से शुरू होकर 13 अगस्त तक चल सकता है। केंद्र सरकार इसके अतिरिक्त कई अन्य महत्वपूर्ण विधेयक सदन में लाएगी। कांग्रेस सहित अन्य विरोधी दल भी पूरी तैयारी के साथ सदन में उपस्थित होंगे।

सेवानिवृत्ति की आयु सीमा तय करना एक नीतिगत मामला, इसमें हाई कोर्ट को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये : सर्वोच्च न्यायालय

सर्वोच्च न्यायालय ने प्रयागराज (इलाहाबाद) हाईकोर्ट के एक फैसले को रद्द किया, जिसमें निर्देश दिया गया था कि सितंबर 2012 में न्यू ओखला औद्योगिक विकास प्राधिकरण (नोएडा) द्वारा अपने कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति की आयु 58 से बढ़ाकर 60 वर्ष करने के निर्णय को पुरानी तिथि से लागू किया जाए। जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने फैसले के खिलाफ नोएडा द्वारा दायर एक अपील की अनुमति देते हुए कहा कि उच्च न्यायालय ने सेवानिवृत्ति की आयु के संबंध में कार्यकारी नीति के एक डोमेन पर ध्यान दिया।
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि, "क्या सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाई जानी चाहिए यह नीतिगत मामला है। यदि सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने का निर्णय लिया गया है, तो जिस तिथि से इसे लागू की जानी चाहिए वह नीति के दायरे में आती है।" कोर्ट ने कहा कि निर्णय की दुर्बलता इस तथ्य में निहित है कि उच्च न्यायालय ने नीति निर्माण के दायरे में प्रवेश किया है और कार्यपालिका के क्षेत्र में आने वाले मामले पर अधिकार क्षेत्र को अपने लिए ग्रहण कर लिया है। क्या सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाई जानी चाहिए और यदि हां, तो जिस तिथि से इसे लागू किया जाना चाहिए वह नीतिगत मामला है जिसमें उच्च न्यायालय को प्रवेश नहीं करना चाहिए था।
 न्यायालय ने कहा कि 30 सितंबर 2012 से पहले सेवानिवृत्त हुए कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने के निर्णय का लाभ नहीं देना मनमाना है। सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के इस दृष्टिकोण से असहमत जताते हुए कहा कि, "क्या सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने का निर्णय नोएडा द्वारा पारित प्रस्ताव पर वापस जाना चाहिए या राज्य सरकार द्वारा अनुमोदन की तारीख से प्रभावी किया जाना चाहिए, यह राज्य सरकार के लिए तय करने का मामला है। आखिरकार, हर कटौती को आकर्षित करने में कुछ कर्मचारी लाइन के एक तरफ खड़े होंगे जबकि अन्य अन्यथा दूरी ओर खड़े होंगे। कठिनाई का यह तत्व उच्च न्यायालय के लिए यह मानने का आधार नहीं हो सकता कि निर्णय मनमाना था। जब राज्य सरकार ने मूल रूप से 28 नवंबर 2001 को अपने स्वयं के कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति की आयु अट्ठावन से साठ वर्ष तक बढ़ाने का फैसला किया, इसने सार्वजनिक क्षेत्र के निगमों को वित्तीय प्रभाव के आधार पर निर्णय लेने के लिए छोड़ दिया, जिसके परिणामस्वरूप यदि वे अपने स्वयं के कर्मचारियों के लिए सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ा सकते हैं।"
न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ द्वारा लिखित निर्णय में कहा गया है कि चूंकि सेवानिवृत्ति की आयु को बढ़ाना एक सार्वजनिक कार्य है जो क़ानून और सेवा नियमों के प्रावधानों द्वारा संचालित है, प्रॉमिसरी एस्टॉपेल के सिद्धांत का उपयोग नोएडा की कार्रवाई को चुनौती देने के लिए नहीं किया जा सकता है। हालांकि नोएडा ने 'तत्काल प्रभाव' के साथ वृद्धि के लिए राज्य सरकार की मंजूरी मांगी थी, संभावित रूप से लागू सरकारी आदेश को पूर्वव्यापी प्रभाव देने का इरादा या चित्रित नहीं किया था। नोएडा का प्रतिनिधित्व एक वैध उम्मीद को जन्म नहीं दे सकता था क्योंकि यह एक मात्र सिफारिश थी जो राज्य सरकार के अनुमोदन के अधीन थी । इसलिए, वैध अपेक्षा के सिद्धांत को भी वर्तमान मामले के तथ्यों पर कोई लागू नहीं होता है।
न्यू ओखला औद्योगिक विकास प्राधिकरण एंड अन्य बनाम बी.डी. सिंघल एंड अन्य
जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एमआर शाह
15 जुलाई 2021

दिल्ली हाईकोर्ट ने मुख्तारनामें के जरिये संपत्ति रखने के खिलाफ दायर याचिका खारिज की।

दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया जिसमें दिल्ली पुलिस को निर्देश देने का आग्रह किया गया था कि संपत्ति के मालिकाना हक के तौर पर पॉवर ऑफ अटॉर्नी (Power of Attorney) को स्वीकार नहीं करे।

चीफ जस्टिस डी. एन. पटेल और जस्टिस ज्योति सिंह की बेंच ने गुरुवार को वकील और याचिकाकर्ता से पूछा कि क्या आप चाहते हैं कि दिल्ली पुलिस घर-घर जाकर सर्वे करे?

याचिका दायर करने वाले वकील मनोहर लाल शर्मा ने कहा कि दिल्ली पुलिस को जब शिकायत मिलती है कि किसी व्यक्ति ने पॉवर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर संपत्ति रखी है तो उसे कार्रवाई करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि पॉवर ऑफ अटॉर्नी अवैध दस्तावेज है और अगर किसी व्यक्ति ने इसके आधार पर कोई संपत्ति रखी है तो उस पर भारतीय दंड संहिता और कालाधन कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए।

हाईकोर्ट ने शर्मा से कहा कि वह या तो याचिका वापस ले लें अन्यथा उन पर वह जुर्माना लगाएगी। कोर्ट ने कहा कि हम नोटिस जारी करना नहीं चाहते हैं। हम वकील पर जुर्माना नहीं लगाना चाहते हैं। इसके बाद वकील ने याचिका वापस ले ली।

याचिका में कहा गया कि पॉवर ऑफ अटॉर्नी के माध्यम से बिक्री काला धन छुपाने और टैक्स से बचने के लिए होता है जो गंभीर अपराध है। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि जांच में उन्होंने पाया कि पॉवर ऑफ अटॉर्नी के माध्यम से बिचौलिए काफी संख्या में बेनामी संपत्ति खरीदते हैं और इसका इस्तेमाल वे किराये के व्यवसाय में करते हैं। 

स्रोत- हिंदुस्तान

Thursday, July 15, 2021

दस्तावेज परीक्षण के दौरान तलब किये जाने चाहिये, परीक्षण हो जाने के उपरांत नहीं- सर्वोच्च न्यायालय


Mohd. Ghouseuddin vs. Syed Riazul Hussain [SLP(Crl) 3191/2019]
Coram: Justices AM Khanwilkar and Sanjiv Khanna

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दस्तावेज (दस्तावेजों) को समन करने के अधिकार का प्रयोग तब किया जाना चाहिए जब ट्रायल चल रहा हो और न कि ट्रायल पूरा होने पर।
 अदालत ने तेलंगाना उच्च न्यायालय के एक फैसले के खिलाफ दायर अपील की अनुमति देते हुए इस प्रकार देखा।  उच्च न्यायालय ने पुनरीक्षण आवेदन की अनुमति दी और दस्तावेज (दस्तावेजों) को समन करने के आवेदन को खारिज करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को उलट दिया।
 उच्च न्यायालय के आदेश का विरोध करते हुए, यह तर्क दिया गया कि मुकदमा बहुत पहले ही पूरा हो चुका था और आरोपी से धारा 313 आपराधिक प्रक्रिया संहिता के तहत पूछताछ की गई थी और उसके बाद ही दस्तावेज (दस्तावेजों) को बुलाने के लिए आवेदन किया गया था।
 दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 91 एक अदालत को उस व्यक्ति को सम्मन जारी करने का अधिकार देती है जिसके कब्जे या शक्ति में एक दस्तावेज या चीज माना जाता है, जिसमें उसे उपस्थित होने और पेश करने की आवश्यकता होती है, अगर उसे लगता है कि ऐसा दस्तावेज या चीज आवश्यक है या  परीक्षण के प्रयोजनों के लिए वांछनीय।
 ट्रायल कोर्ट के आदेश पर गौर करते हुए, जस्टिस एएम खानविलकर और संजीव खन्ना की पीठ ने कहा कि उसने दस्तावेज (दस्तावेजों) को समन करने के लिए आवेदन को खारिज करने के लिए ठोस और ठोस कारण दिए थे - इस तरह की राहत के लिए किसी भी औचित्य के बिना इस तरह के विलंबित चरण में स्थानांतरित किया गया था।  
 दस्तावेज (दस्तावेजों) को समन करने का अधिकार वास्तव में उपलब्ध है, लेकिन इसका प्रयोग तब किया जाना चाहिए जब मुकदमा चल रहा हो, न कि जब मुकदमा पूरा हो गया हो, जिसमें आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत आरोपी के बयान दर्ज किए गए थे।  इस तरह के विलंबित आवेदन से मुकदमे की प्रभावशीलता को कम नहीं किया जा सकता है।"
 इस प्रकार देखते हुए, बेंच ने हाई कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए ट्रायल कोर्ट के आदेश को बहाल कर दिया।

उत्तर प्रदेश में अब डीजे बजाने पर रोक नहीं लगेगी। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को पलट दिया है।

न्यायमूर्ति विनीत शरणऔर न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी की पीठ ने दिनांक 15 जुलाई 2021 को प्रयागराज हाईकोर्ट के इस आदेश को सेटेसाइड कर दिया है। पीठ ने कहा है कि एक निजी पक्ष द्वारा दायर याचिका पर इस तरह का सामान्य आदेश पारित नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने प्रभावित पक्ष को बिना सुने ही आदेश पारित कर दिया। 
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट के समक्ष दायर याचिका में इस तरह का आदेश पारित करने की गुहार भी नहीं लगाई गई थी। बावजूद इसके हाईकोर्ट ने डीजे पर प्रतिबंध का आदेश पारित कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून के तहत ऐसा नहीं किया जा सकता।
सुनवाई के दौरान इस कारोबार से जुड़े लोगों की ओर से अधिवक्ता दुष्यंत पाराशर का कहना था कि डीजे ऑपरेटर विवाह समारोह, जन्मदिन पार्टी और खुशी के अन्य मौकों पर अपनी सेवाएं देकर अपना जीवन- यापन करते  हैं। हाईकोर्ट के आदेश से उनकी आजीविका पर संकट पैदा हो गई है। याचिका में कहा गया है यह उनके मौलिक अधिकारों का भी उल्लंघन है।

हस्तलेख परीक्षण के लिये मूल दस्तावेज आवश्यक - इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला देते हुए कहा दस्तावेज़ की केवल फोटो-कॉपी होने पर हस्ताक्षरों की फोरेंसिक अथवा हस्तलेखन विशेष...