Saturday, January 28, 2023

सुप्रीम कोर्ट ने एक ही दिन में कई जमानत अर्जियां खारिज करने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश खारिज किया

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा एक ही दिन में डिफॉल्ट/गैर-अभियोजन की लगभग 50 जमानत अर्जियों को खारिज करने का आदेश खारिज कर दिया। जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी की पीठ हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार कर रही थी जिसमें अभियोजन न चलाने के लिए अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने पिछली सुनवाई में हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार से संबंधित हाईकोर्ट के न्यायाधीश से उनके अजीबोगरीब आचरण के लिए कारणों की मांग करते हुए एक रिपोर्ट मांगी थी।
बेंच ने कहा-
"हमें इस स्तर पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए, लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार को संबंधित न्यायाधीश से प्राप्त करने के बाद इस न्यायालय को रिपोर्ट जमा करने का निर्देश देना चाहिए कि उन पर ऐसा क्या प्रभाव पड़ा कि लगातार लगभग 45 मामलों में एक ही तारीख को एक ही समय में उन्हें नॉन प्रॉसिक्यूशन के लिए खारिज कर दिया। वह भी तब जब किसी ने अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत पवित्र है।"
रजिस्ट्रार ने तब एक हलफनामा दायर किया था, जिसमें यह कहा गया था कि अपीलकर्ता के कहने पर दायर जमानत आवेदन पहली बार 02.07.2021 को सूचीबद्ध किया गया था और उसे अंतरिम सुरक्षा प्रदान की गई थी और उसके बाद मामला लगभग न्यायालय के समक्ष आया था। एक साल बाद 27.09.2022 को पेशी न होने के कारण जमानत अर्जी अभियोजन न होने के कारण खारिज कर दी गई। पीठ के समक्ष अपीलकर्ता ने 27.09.2022 को एक अदालत द्वारा पारित लगभग 50 आदेशों को रिकॉर्ड में रखा, जिसमें गैर-अभियोजन के लिए व्यक्तिगत आवेदकों द्वारा जमानत अर्जी को खारिज कर दिया गया था। न्यायालय ने यह भी देखा कि आदेश न्यायालय द्वारा पारित मानक प्रारूप में हैं।
पहले उदाहरण में हम हाईकोर्ट द्वारा डिफ़ॉल्ट रूप से जमानत अर्जी को खारिज करने के आदेश पारित करने में अपनाई गई इस तरह की प्रथा को अस्वीकार करते हैं। साथ ही अपीलकर्ता की ओर से यह भी उचित नहीं था कि वह उस तारीख को उपस्थित न हो जिस दिन जमानत याचिका दायर की गई थी। मामला सूचीबद्ध था। वह भी 27.09.2022 के आदेश को वापस लेने के लिए आवेदन करने के लिए स्वतंत्र था, जिसे इस न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गई थी।"
पहले उदाहरण में हम हाईकोर्ट द्वारा डिफ़ॉल्ट रूप से जमानत अर्जी को खारिज करने के आदेश पारित करने में अपनाई गई इस तरह की प्रथा को अस्वीकार करते हैं। साथ ही अपीलकर्ता की ओर से यह भी उचित नहीं था कि वह उस तारीख को उपस्थित न हो जिस दिन जमानत याचिका दायर की गई थी। मामला सूचीबद्ध था। वह भी 27.09.2022 के आदेश को वापस लेने के लिए आवेदन करने के लिए स्वतंत्र था, जिसे इस न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गई थी।"
स्रोत-लाइव लॉ

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