Friday, June 7, 2024

छत्रपति शिवाजी महाराज भारतीय समाज के आदर्श हैं- अजय शर्मा


सम्भल
भारतीय इतिहास संकलन समिति के तत्वावधान में हिंदू साम्राज्य दिवस पर विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया । 
नगर के साहनी वाला फाटक में स्थित शिव मंदिर में सर्वप्रथम छत्रपति शिवाजी महाराज के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित करके पुष्प अर्पित किए गए ।
ज्ञान प्रकाश उपाध्याय ने शिवाजी महाराज के जीवन पर डालते हुए काव्य पाठ प्रस्तुत किया ।
जिला अध्यक्ष अजय कुमार शर्मा ने कहा छत्रपति शिवाजी महाराज एक भारतीय शासक थे जिन्होंने मराठा साम्राज्य खड़ा किया था इसीलिए उन्हें एक अग्रगण्य वीर एवं अमर स्वतंत्रता-सेनानी स्वीकार किया जाता है। वीर शिवाजी राष्ट्रीयता के जीवंत प्रतीक एवं परिचायक हैं । शिवाजी राष्ट्रवाद के विचार में विश्वास करते थे, जहाँ उनकी प्रजा का कल्याण और समृद्धि सर्वोपरि थी। उन्होंने विदेशी शासन से मुक्त एक ऐसी भूमि की कल्पना की, जहाँ प्रत्येक नागरिक को पनपने का अवसर मिले । 
प्रवीण रस्तौगी ने कहा शिवाजी का नाम साहस, स्वतंत्रता की भावना और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का एक आदर्श उदाहरण है, जो हमें लचीलेपन की शक्ति और सभी के लिए न्याय और समानता की खोज की याद दिलाता है।
मीनू रस्तौगी ने कहा 6 जून 1674 को हिंदू साम्राज्य की स्थापना छत्रपति शिवाजी महाराज ने की थी । 6 जून का दिन पूरे हिंदुस्तान के लिए बड़ा गौरवमयी माना जाता है। इसी दिन मुगलों को परास्त करके शिवाजी वापस लौटे थे और उनका सम्राट के रूप में राज्याभिषेक हुआ था।
पंकज सांख्यधर ने कहा छत्रपति शिवाजी महाराज का जीवन वीरता, दृढ़ संकल्प और अपने लोगों के प्रति अटूट प्रतिबद्धता के लिए समर्पित था। उनकी लड़ाइयों, संघर्षों और प्रशासनिक कौशल ने मराठा साम्राज्य की स्थापना की और भारतीय इतिहास की दिशा को आकार दिया। आज भी शिवाजी की विरासत राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक के रूप में जीवित है और अपनी असाधारण उपलब्धियों से लाखों लोगों को प्रेरित करती है। 
इस अवसर पर सुभाष चंद्र शर्मा, अतुल कुमार शर्मा, अमन सिंह, राजेंद्र सिंह गुर्जर, प्रवीण रस्तोगी, मीनू रस्तोगी, शलभ रस्तोगी, विपिन कुमार, वैभव गुप्ता, पंकज सांख्यधर, ज्ञान प्रकाश उपाध्याय आदि उपस्थित रहे।
कार्यक्रम की अध्यक्षता जिला अध्यक्ष अजय कुमार शर्मा ने तथा संचालन जिला सहमंत्री सुबोध कुमार गुप्ता ने किया।

Thursday, June 6, 2024

आ. भा. वि. प. द्वारा पर्यावरण दिवस पर वृक्षारोपण किया गया

चन्दौसी (सम्भल)
1 जून से 5 जून अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद मेरठ प्रांत द्वारा पूरे प्रांत में संचालित सामाजिक अनुभूति कार्यक्रम के निमित आज एबीवीपी जिला संभल ने तहसील संयोजक भुवनेश बघेल के नेतृत्व में, जिलें के कई गांवों में जाकर ग्रामीण जीवन को जानने के प्रयास से ग्रामीण लोगों से बातचीतकर के वहां के जीवन के बारे में जाना और वहां के जीवन का अनुभव किया क्योंकि समाजिक अनुभूति में छात्रों को ग्रामीण जीवन के अनुभवों से रूबरू कराना होता है जिससे बह ग्रामीण जीवन के संघर्ष को अच्छे से समझ सकें और साथ ही आज 5 जून पर्यावरण के अवसर पर सहजनी गांव में वृक्षारोपण भी किया, क्योंकि बढ़ती गर्मी को देखते हुऐ, आज़ के समय में वृक्षारोपण बहुत ज़रूरी हो गया इसलिए सभी वृक्षारोपण ज़रूर करना चाहिए।

विभाग संयोजक आकाश कुमार ने कहा कि समाजिक अनुभूति कार्यक्रम बहुत शानदार कार्यक्रम है इससे छात्रों को असल भारत के दर्शन होते हैं। और छात्र भारतीय ग्रामीण जन जीवन के संघर्षों को अच्छे से समझते और अनुभव भी करते हैं की गांव और शहर के जीवन में क्या अंतर होता है, सभी छात्रों को गांव में जाकर यह सब ज़रूर अनुभव करना चाहिए।

नगर उपाध्यक्ष, वी.के.त्रिपाठी ने कहा कि  हम सभी को ग्रामीण क्षेत्र में कम से कम दो या तीन  दिन  बिताकर्  उनके जीवन में  सुख दुःख , सुविधाओं  कमियों, स्वास्थ्य,शैख़िक जैसे मुद्दों को जानना और समझना चाहिए जिससे हम उनकी कुछ संभव मदद कर सकें।

इस अवसर पर, अखिलेश श्रीवास्तव, आकाश कुमार,भुवनेश बघेल, विवेक त्रिपाठी, लक्ष्मण यादव, धर्म सिंह और अरविंद बघेल उपस्थित रहें।

Wednesday, June 5, 2024

केवल हत्या के हथियार की बरामदगी के आधार पर दोषसिद्धि नहीं हो सकती, दोषसिद्धि के लिए पुष्टिकारक साक्ष्य जरूरी: झारखंड हाइकोर्ट ने हत्या के दोषी व्यक्ति को बरी किया 

झारखंड हाइकोर्ट ने हत्या के दोषी व्यक्ति को बरी करते हुए कहा कि केवल हत्या के हथियार की बरामदगी के आधार पर दोषसिद्धि नहीं हो सकती। न्यायालय ने संदेह से परे दोषसिद्धि के लिए पुष्टिकारक साक्ष्य की आवश्यकता पर बल दिया। जस्टिस आनंद सेन और जस्टिस सुभाष चंद की खंडपीठ ने कहा, "हमारी राय में केवल हत्या के हथियार की बरामदगी के आधार पर दोषसिद्धि नहीं हो सकती। सभी संदेह से परे आरोपी के अपराध को स्थापित करने के लिए कुछ पुष्टिकारक साक्ष्य होने चाहिए। हथियार की बरामदगी के लिए इकबालिया बयान अकेले दोषसिद्धि का आधार नहीं हो सकता। अन्य विश्वसनीय पुष्टिकारक साक्ष्य होने चाहिए।"
"अगर हत्या का हथियार बरामद भी हो जाए और उस पर खून के धब्बे भी हों तो भी आरोपी का अपराध सिद्ध नहीं होता। यह अकेली परिस्थिति अपीलकर्ता को दोषी ठहराने का आधार नहीं हो सकती। बरामदगी को छोड़कर अन्य परिस्थितियों पर भी गौर किया जाना चाहिए और अपीलकर्ता को दोषी ठहराने के लिए कुछ पुष्टीकरण होना चाहिए। इस मामले में कोई अन्य पुष्टीकरण सामग्री नहीं है, बल्कि कोई सबूत ही नहीं है।" मृतक की पत्नी ने एफआईआर दर्ज कराई, जिसमें कहा गया कि वह काम के लिए खेत गई थी, जब उसकी भाभी ने उसे बताया कि उसके पति पर उसके भाई ने कुल्हाड़ी से हमला कर दिया। हमले के परिणामस्वरूप उसका पति आंगन में बेहोश पड़ा मिला। वह तुरंत घर पहुंची और घायल पति को अस्पताल ले जाया गया। शुरू में भारतीय दंड संहिता की धारा 326/307 के तहत एफआईआर दर्ज की गई। बाद में भारतीय दंड संहिता की धारा 302 को जोड़ा गया।
सत्र न्यायाधीश ने बाद में भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत अपीलकर्ता को अपराध का दोषी ठहराया। इस सजा से व्यथित होकर अपीलकर्ता ने वर्तमान अपील दायर की। अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि घटना के कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं थे। इसके अतिरिक्त यह तर्क दिया गया कि केवल हथियार की बरामदगी भले ही अपीलकर्ता के कबूलनामे के माध्यम से हत्या के हथियार के रूप में पहचान की गई हो, पुष्टि करने वाले साक्ष्य के बिना दोषसिद्धि के लिए अपर्याप्त है ।

दूसरी ओर राज्य ने यह दावा करके जवाब दिया कि इंफॉर्मेंट घटना का प्रत्यक्षदर्शी था और अपीलकर्ता को केवल प्रत्यक्षदर्शी की गवाही के आधार पर दोषी ठहराया जा सकता है। इसके अलावा राज्य ने प्रस्तुत किया कि हत्या का हथियार अभियुक्त के कबूलनामे के आधार पर बरामद किया गया। पूरे साक्ष्य की समीक्षा करने पर न्यायालय ने पाया कि पी.डब्लू.3 को छोड़कर अन्य सभी गवाह जो प्रत्यक्षदर्शी के रूप में प्रस्तुत हुए, अफवाहों के गवाह थे। न्यायालय ने इंफॉर्मेंट के फर्दबयान में दिए गए बयान और न्यायालय के समक्ष उसकी गवाही के बीच महत्वपूर्ण विरोधाभास को भी उजागर किया।

न्यायालय ने कहा, "फर्दबयान में उसके बयान से यह स्पष्ट है कि वह प्रत्यक्षदर्शी नहीं है जबकि न्यायालय के समक्ष पी.डब्लू.3 के रूप में उसके बयान में वह प्रत्यक्षदर्शी बन जाती है। हम मानते हैं कि वह घटना की प्रत्यक्षदर्शी नहीं है, इसलिए तथ्य यह है कि पूरी घटना का कोई अन्य प्रत्यक्षदर्शी नहीं है।" न्यायालय ने आगे कहा, "इसके बाद एकमात्र परिस्थिति जो बची है, वह अपीलकर्ता द्वारा बताए गए इकबालिया बयान पर हत्या के हथियार की बरामदगी है।"

न्यायालय ने सत्ये सिंह बनाम उत्तराखंड राज्य (2022) 5 एससीसी 438 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा किया, जिसमें कहा गया था कि दोषसिद्धि केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर हो सकती है। हालांकि ऐसे साक्ष्यों को कानूनी मानक के खिलाफ परखा जाना चाहिए कि सभी परिस्थितियों को निर्णायक रूप से यह इंगित करना चाहिए कि आरोपी ने ही अपराध किया है और किसी और ने नहीं। न्यायालय ने अपील स्वीकार करते हुए कहा, "इस प्रकार जो पहले माना गया, उसके मद्देनजर हम इस अपील को स्वीकार करने और अपीलकर्ता को बरी करने के लिए इच्छुक हैं। सत्र न्यायाधीश सिमडेगा द्वारा सत्र परीक्षण संख्या 01/2019 में पारित दिनांक 24 जुलाई, 2023 को दोषसिद्धि का निर्णय और सजा का आदेश निरस्त किया जाता है। अपीलकर्ता को उसके विरुद्ध लगाए गए आरोपों से बरी किया जाता है। यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है तो उसे तत्काल हिरासत से रिहा करने का निर्देश दिया जाता है।” 
वाद शीर्षक- संजय कुजूर बनाम झारखंड राज्य





Tuesday, May 21, 2024

‘Two-finger test’ in Rape Cases: Supreme Court takes a firm stand and directs Meghalaya government to eradicate the evil practice


In a recent order, the Supreme Court (SC) expressed its disappointment over the use of ‘two-finger test’ in a rape case despite being deprecation by the apex court. The bench constituting Justice Rajesh Bindal and Justice CT Ravikumar took a firm stand against the controversial ‘two-finger test’ and directed the Meghalaya government to ensure the eradication of this evil practice. During the proceedings, the SC considered the decision in Lillu @ Rajesh and Anr. vs. State of Haryana case which states that the ‘two-finger test’ violates the privacy of rape victims. The bench also noted that the decision in the Lillu case was passed before the occurrence of the present incident. It said “It is true that the incident in the case on hand had happened a decade ago, to be precise, on 26.10.2013. Thus, the case on hand revealed the continuance of contumacious conduct of conducting the “two-finger test” even after the decision of this Court in Lillu Alias Rajesh and Anr. v. State of Haryana…”

The SC bench was hearing an appeal against the decision of the High Court that affirmed the conviction of an accused for the offence of rape. It illustrated that “While considering the petition and coming across the shocking incident which reveal that despite the prohibition on practice of conducting ‘two-finger test’ to determine whether a victim of a rape was habituated to sexual intercourse, which act strongly deprecated by this Court as it being regressive and invasive nature of test, we put a question to the learned counsel for the State as to what steps have been taken to ensure to eradicate this evil practice, in the light of various decisions of this Court.” In addition, the learned Advocate General of the State of Meghalaya Shri Amit Kumar submitted that “in compliance with the decision of this Court in ‘State of Jharkhand vs. Shailendra Kumar Rai @ Pandav Rai,’ appropriate action to eradicate the evil practice has been taken.” In the Shailendra Kumar Rai case, the SC reiterated the prohibition of the ‘two-finger test’ in rape cases and warned that violation of directions issued by the court would be treated as misconduct and appropriate disciplinary action would be taken.

In context with this, the SC bench held that “When a particular practice which is deprecated by this Court repeatedly and described it as a regressive and invasive nature, we are of the considered view that the proposed action in terms of the said letter dated 29.4.2024 should have been specific and the consequences must have been spelt out as of serious nature.” The SC bench listed the matter for further hearing on September 09, 2024. 

किशोर होने की दलील किसी भी अदालत में और किसी भी स्तर पर, यहां तक ​​कि मामले के अंतिम निपटारे के बाद भी उठाई जा सकती है: सुप्रीम कोर्ट


हाल के एक आदेश में, न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की सर्वोच्च न्यायालय (एससी) पीठ ने कहा कि मामले के अंतिम निपटारे के बाद भी, किसी भी अदालत में और किसी भी स्तर पर किशोर होने की दलील उठाई जा सकती है। पीठ ने आगे टिप्पणी की, "यह बिना किसी संदेह के कहा जा सकता है कि अपीलकर्ता द्वारा उठाई गई किशोर होने की दलील को उचित जांच किए बिना खारिज नहीं किया जा सकता था।" शीर्ष अदालत पटना उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ अपील पर सुनवाई कर रही थी। इस मामले में, अपीलकर्ता और सह-अभियुक्तों पर भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 302 और 394 और शस्त्र अधिनियम, 1959 की धारा 27 (2) के तहत दंडनीय अपराधों के लिए विद्वान प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा मुकदमा चलाया गया था। ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता और सह-अभियुक्तों को उपरोक्त अपराधों के लिए दोषी ठहराया और उन्हें मौत की सजा सुनाई।

Wednesday, May 8, 2024

Court Imposes Rs. 10,000/- Cost For Filing Affidavit WithoutDeponent's Signature, DirectsRemoval Of OathCommissioner For Fraud:Allahabad High Court

Allahabad
Hon'ble High Court (Case: CRIMINAL
MISC. BAIL APPLICATION No.
2835 of 2024) has taken strict
action against an Oath
Commissioner, Sri Kamlesh Singh,
for irregularities in executing an
affidavit. The case, presided over
by Hon'ble Vikram D. Chauhan, J.,
highlighted the critical role of Oath
Commissioners and emphasized
the need for maintaining the
highest standards of professional
ethics.

Monday, March 18, 2024

Consumer - Housing project - Delay inhanding over possession - Complainantcannot be expected to wait for anindefinite time period to get the benefits ofthe hard-earned money which they havespent in order to purchase the property inquestion.

Consumer Protection Act, 1986 Section 2(1)(g) Housing project - Delay in handing over possession - Whether the Opposite Party is liable for deficiency in service in so much so it failed to offer possession within the stipulated time - Yes - Held that the Opposite Party is deficient in providing its services to the Complaint as the Opposite Party failed to comply with the contractual obligations as per Memorandum of Understanding and Agreement - Opposite Party failed to handover the possession of the said residential unit even after passage of 7 years from the date on which parties entered into agreement - Refund with interest.

Sunday, March 17, 2024

नए आपराधिक कानूनों में क्या है नया - विश्लेषण

भारतीय दंड संहिता, 1860, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 और दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 हमारे यहां आपराधिक न्याय प्रणाली के तीन स्तंभ हैं। भारतीय दंड संहिता के प्रणेता थॉमस बैबिंग्टन मैकाले थे, जिन्होंने प्रथम विधि आयोग की अध्यक्षता की थी। भारतीय साक्ष्य अधिनियम के लेखक सर जेम्स फिट्जेम्स स्टीफन थे। ऐसे ही वर्ष 1973 में नया कानून पारित कर 1898 की दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) को निरस्त कर दिया गया था। देश भर की सैकड़ों अदालतों में रोज इन तीनों कानूनों का इस्तेमाल होता है। हजारों जज और 1,50,000 से अधिक वकील (जिनमें से ज्यादातर फौजदारी मामलों से जुड़े होते हैं) लगभग रोज ही इन तीन कानूनों से गुजरते हैं। हर जज या वकील यह जानता है कि आईपीसी की धारा 302 हत्या के मामले में लगती है। वे जानते हैं कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 के तहत किसी पुलिस अधिकारी के सामने दिए गए बयान से अदालत में आरोपी के खिलाफ अपराध तय नहीं होते। वे यह भी जानते हैं कि सीआरपीसी की धारा 437, 438 और 439 में अग्रिम जमानत और जमानत देने के प्रावधान हैं। इन तीनों कानूनों में ऐसे अनेक प्रावधान हैं, जिनके बारे में जजों और वकीलों को गहराई से जानकारी है। भारत में आपराधिक कानूनों में सुधार की दिशा में काम 2020 में आपराधिक कानूनों में सुधार समिति (सीआरसीएल) के गठन के साथ शुरू हुआ। इस प्रक्रिया ने अपना अंतिम मोड़ तब लिया जब 11 अगस्त, 2023 को गृह मंत्री ने सदियों पुरानी भारतीय दंड संहिता, 1860 दंड प्रक्रिया संहिता 1973 को पूरी तरह से बदलने के लिए लोकसभा (भारतीय संसद के निचले सदन) में 3 विधेयक पेश किए। मूल रूप से 1898) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 और उन्हें क्रमशः भारतीय न्याय संहिता, 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 और भारतीय साक्ष्य विधेयक, 2023 से प्रतिस्थापित करें। इस कदम की विभिन्न शिक्षाविदों और विद्वानों सहित कई लोगों ने सराहना की। साथ ही, कुछ लोग इसके बारे में आलोचनात्मक बने रहे, उन्होंने इसे सदियों पुराने अक्षुण्ण कानूनों को बदलने के लिए अनावश्यक और निरर्थक बताया, जिससे विशाल आपराधिक न्यायशास्त्र में गड़बड़ी हुई। विधेयकों को आगे की जांच के लिए संसदीय स्थायी समिति को भेजा गया। New Criminal Laws नया आपराधिक कानून 1 जुलाई से लागू होने वाला है। ससंद के शीतकालीन सत्र में इन तीनों कानूनों को पास किया गया था। इन तीनों कानून के लागू होने से भारत की न्याय प्रणाली दुनिया की सबसे आधुनिक न्याय प्रणाली होगी। इस नये प्रस्तावित कानून में कई खूबियां हैं और इसे विशेषकर अपराध के पीड़ित को ध्यान में रख कर बनाया गया है। New Criminal Laws: धोखाधड़ी करने वाला नहीं कहलाएगा '420', बदल गई हत्या की धारा; तीन नए कानून की खास बातों पर डालें एक नजर तीन नए क्रिमिनल लॉ में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। नाबालिगों से दुष्कर्म के लिए आजीवन कारावास या मृत्युदंड का प्रविधान किया गया है। हिट एंड रन से संबंधित धारा तुरंत नहीं होगी लागू। राजद्रोह की जगह देशद्रोह का इस्तेमाल किया गया है। तीन नए क्रिमनल लॉ एक जुलाई से लागू होने वाले हैं। गृह मंत्रालय ने आराधिक भारतीय न्याया संहित, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के लागू होने संबंध में अधिसूचना जारी कर दी है। तीनों कानून अंग्रेजों के जमाने में बनाए गए आइपीसी, सीआरपीसी और साक्ष्य कानून की जगह लेंगे। एक जुलाई से विभिन्न अपराधों के लिए एफआईआर नए कानून की धाराओं के तहत मामले दर्ज किए जाएंगे। तीनों कानून को पिछले साल 21 दिसंबर को संसद से मंजूरी मिल गई थी। नए कानूनों को लागू होने के बाद आतंकवाद से जुड़े मामलों में गैर कानूनी गतिविधि रोकथाम कानून (UAPA) के अलावा भारतीय न्याय संहिता और भारतीय नागरिक और सीआरपीसी कानून में इसका कोई प्रविधान नहीं था। इसी तरह मॉब लीचिंग भी पहली बार अपराध की श्रेणी में आ जाएगा। इन तीन नए कानून की खास बातों पर एक नजर आइपीसी में 511 धाराएं थीं, जबकि इसकी जगह लाई गई भारतीय न्याय संहिता में 358 धाराएं हैं। सीआरपीसी में 484 धाराएं थीं, जबकि इसकी जगह लाई गई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में 531 धाराएं हैं। साक्ष्य अधिनियम में 166 धाराएं थी, जबकि भारतीय साक्ष्य अधिनियम में 170 धाराएं हैं। आईपीसी की धारा 302 के तहत हत्या के मामले में सजा दिए जाने का प्रावधान है। हालांकि, नए कानून में हत्या की धारा 101 होगी। धोखाधड़ी के लिए धारा 420 के तहत मुकदमा चलता था। अब नए कानून में धोखाधड़ी के लिए धारा 316 लगाई जाएगी। अवैध जमावड़े से संबंधित मुकदमा धारा 144 के तहत चलता है। अब नए कानून के अनुसार इस मामले पर दोषियों के खिलाफ धारा 187 के तहत मुकदमा चलेगा। आईपीसी की धारा 124-ए राजद्रोह के मामले में लगती थी, अब कानून की धारी 150 के तहत मुकदमा चलेगा। राजद्रोह की जगह देशद्रोह का इस्तेमाल किया गया है। लोकतांत्रिक देश में सरकार की आलोचना कोई भी कर सकता है, यह उसका अधिकार है लेकिन अगर कोई देश की सुरक्षा, संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का काम करेगा तो उसके खिलाफ देशद्रोह के तहत कार्रवाई होगी। उसे जेल जाना पड़ेगा। नए आतंकवाद कानून के तहत कोई भी व्यक्ति जो देश के खिलाफ विस्फोटक सामग्री, जहरीली गैस आदि का उपयोग करेगा तो वह आतंकवादी है। आतंकवादी गतिविधि वह है जो भारत सरकार, किसी राज्य या किसी विदेशी सरकार या किसी अंतरराष्ट्रीय सरकारी संगठन की सुरक्षा को खतरे में डालती है। भारत से बाहर छिपा आरोपित यदि 90 दिनों के भीतर अदालत में उपस्थित नहीं होता है तो उसकी अनुपस्थिति के बावजूद उस पर मुकदमा चलेगा। अभियोजन के लिए एक लोक अभियोजक की नियुक्ति की जाएगी। नाबालिगों से दुष्कर्म के लिए आजीवन कारावास या मृत्युदंड का प्रविधान किया गया है। सामूहिक दुराचार के मामले में 20 साल की कैद या आजीवन कारावास का प्रविधान किया गया है। हिट एंड रन से संबंधित धारा तुरंत नहीं होगी लागू केंद्र सरकार ने भारतीय न्याय संहिता की धारा-106 (2) को फिलहाल स्थगित रखा है यानी हिट एंड रन से जुड़े अपराध से संबंधित ये प्रविधान एक जुलाई से लागू नहीं होगा। इस धारा के विरोध में जनवरी के पहले सप्ताह में देशभर में चालकों ने हड़ताल के बाद सरकार को केंद्र सरकार ने आश्वासन दिया था कि इस कानून को अखिल भारतीय मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के परामर्श के बाद ही अमल में लाया जाएगा। इस कानून के तहत उन चालकों को 10 साल तक की कैद और जुर्माने का प्रविधान है जो तेज गति और लापरवाही से वाहन चलाकर किसी व्यक्ति की मौत का कारण बनते हैं और घटना के बाद किसी पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट को इसकी सूचना दिए बिना वहां से भाग जाते हैं। भारतीय न्याय संहिता, 2023 भारतीय न्याय संहिता में 356 धाराएँ हैं, जिनमें से 175 धाराएँ भारतीय दंड संहिता से ली गई हैं, जिनमें परिवर्तन और संशोधन हुए हैं, 22 को निरस्त किया गया है, और 8 नई धाराएँ जोड़ी गई हैं। नए कोड में छोटे अपराधों के लिए सजा के एक नए रूप के रूप में "सामुदायिक सेवा" भी पेश की गई है। भाषा परिवर्तन नया कोड ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के तहत परिभाषित पुरुषों, महिलाओं और "ट्रांसजेंडर" को कवर करने के लिए पुरुष सर्वनाम की परिभाषा का विस्तार करता है। मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 के तहत परिभाषित वाक्यांश "मानसिक बीमारी", पागलपन और मानसिक अस्वस्थता के स्थान पर प्रयोग किया जाता है। नए प्रावधान और परिभाषाएँ महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध नए प्रावधानों और अपराधों के साथ महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों से निपटने वाला एक नया अध्याय पेश किया गया है। आईपीसी के तहत, ये अपराध मानव शरीर के खिलाफ अपराधों से संबंधित अध्याय का हिस्सा हैं। आईपीसी के तहत, धारा 376DA और 376DB क्रमशः 16 साल से कम उम्र और 12 साल से कम उम्र की लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार के लिए सजा का प्रावधान करती है। अगर लड़की 16 साल से कम उम्र की है तो सजा आजीवन कारावास है। यदि लड़की 12 वर्ष से कम उम्र की है, तो सजा आजीवन कारावास या मृत्युदंड हो सकती है। हालाँकि, प्रस्तावित संहिता के तहत, धारा 70(2) में प्रावधान है कि यदि व्यक्तियों का एक समूह 18 वर्ष से कम उम्र की किसी भी लड़की के साथ बलात्कार करता है, तो उन्हें आजीवन कारावास या यहाँ तक कि मौत की सज़ा भी हो सकती है। कपटपूर्ण साधनों का उपयोग करके संभोग करना। यह नए कोड में महत्वपूर्ण परिवर्धनों में से एक है। प्रस्तावित संहिता की धारा 69 के तहत, कोई व्यक्ति जो धोखे से या शादी का झूठा आश्वासन देकर किसी महिला के साथ बलात्कार की श्रेणी में नहीं आने वाला यौन संबंध बनाता है, उसे उत्तरदायी होने के अलावा, दस साल तक की कैद की संभावित सजा का सामना करना पड़ेगा। जुर्माने के लिए. इससे पहले, शादी के वादे पर यौन संबंध बनाने को आईपीसी की धारा 375 के तहत बलात्कार के अपराध के रूप में दंडित किया जाता था और उक्त प्रावधान इसे एक अलग अपराध के रूप में सूचीबद्ध नहीं करता था। अपराध करने के लिए 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को काम पर लगाना। प्रस्तावित संहिता के तहत, यदि कोई अपराध करने के लिए 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को काम पर रखता है, तो ऐसे व्यक्ति को बच्चों द्वारा किए गए अपराध के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा। उतावलेपन या लापरवाही से किए गए कार्य से मृत्यु कारित करना और घटना स्थल से भाग जाना प्रस्तावित संहिता की धारा 104(2) ऐसे व्यक्ति के लिए उच्च कारावास से दंडित करने का प्रावधान करती है जो जल्दबाजी या लापरवाही से किए गए कार्य से मौत का कारण बनता है और फिर घटना स्थल से भाग जाता है। ऐसे में अधिकतम सजा 7 साल तक और जुर्माना है. मॉब लिंचिंग अपराध, हालांकि अलग से परिभाषित नहीं है, हत्या के समान प्रावधान के तहत दंडनीय है, अर्थात, धारा 101। प्रस्तावित संहिता की धारा 101 में नस्ल, जाति या समुदाय, लिंग, जन्म स्थान, भाषा, के आधार पर हत्या के लिए सजा का प्रावधान है। व्यक्तिगत विश्वास या 'कोई अन्य आधार'। यह अपराध मृत्युदंड या आजीवन कारावास या सात साल या उससे अधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय है। आईपीसी के तहत, मॉब लिंचिंग को सामान्य इरादे से की गई हत्या के रूप में निपटाया जाता है और तदनुसार दंडित किया जाता है। आईपीसी के तहत, हत्या की सज़ा या तो मौत है या आजीवन कारावास है। हालाँकि, भारतीय न्याय संहिता की धारा 101(2) में आजीवन कारावास और मृत्युदंड के अलावा सात साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है। संगठित अपराध और छोटे संगठित अपराध संगठित अपराध को पहली बार दंड संहिता के तहत परिभाषित किया जाएगा। प्रस्तावित संहिता की धारा 109(1) संगठित अपराध को निरंतर अवैध गतिविधियों के रूप में परिभाषित करती है, जिसमें अपहरण, डकैती, वाहन चोरी, जबरन वसूली, भूमि पर कब्जा करना, अनुबंध हत्या आदि शामिल हैं, जो व्यक्तियों के समूहों द्वारा अकेले या संयुक्त रूप से किए जाते हैं। हिंसा, धमकी, धमकी या अन्य गैरकानूनी तरीकों का उपयोग करके वित्तीय या भौतिक लाभ प्राप्त करना। धारा 109(2) के अनुसार, जो कोई भी संगठित अपराध करने का प्रयास करेगा या करेगा जिसके परिणामस्वरूप मृत्यु होगी, उसे मृत्युदंड या आजीवन कारावास की सजा के साथ-साथ कम से कम ₹10 लाख का जुर्माना लगाया जाएगा। ऐसे मामलों में जहां कार्य के परिणामस्वरूप मृत्यु नहीं होती है, तो इसमें शामिल व्यक्ति या व्यक्तियों को कम से कम पांच साल के कारावास की सजा होगी, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है, साथ ही कम से कम ₹5 लाख का जुर्माना भी लगाया जा सकता है। धारा 109(3) से 109(7) में संगठित अपराध से जुड़ी सहायता करने, उकसाने, सदस्यता लेने, अपराधी को शरण देने या संपत्ति रखने पर लागू दंडों का विवरण देने वाले प्रावधान शामिल हैं। धारा 110 छोटे संगठित अपराधों को वाहनों की चोरी या वाहनों से चोरी, घरेलू और व्यावसायिक चोरी, चाल चोरी, कार्गो अपराध, स्नैचिंग, दुकान से चोरी, एटीएम चोरी और सार्वजनिक परीक्षा प्रश्न पत्रों की बिक्री के रूप में परिभाषित करती है। जो कोई भी छोटे-मोटे संगठित अपराध करने का प्रयास करेगा या करेगा, उसे कम से कम एक साल की कैद होगी, जिसे सात साल तक बढ़ाया जा सकता है। आतंकवादी अधिनियम एक और पहली बार, प्रस्तावित कोड के तहत एक 'आतंकवादी कृत्य' को परिभाषित किया गया है। धारा 111(1) के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर भारत की एकता, अखंडता और सुरक्षा को खतरे में डालने वाली किसी कार्रवाई में शामिल होता है, तो उसे आतंकवादी कृत्य माना जाता है: भय पैदा करने, मृत्यु का कारण बनने, व्यक्तियों को नुकसान पहुँचाने या जीवन को खतरे में डालने के लिए घातक साधनों का उपयोग करना। सार्वजनिक या निजी संपत्ति को क्षति या व्यवधान उत्पन्न करके। महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाकर या नष्ट करके, महत्वपूर्ण प्रणालियों को बाधित करके। सरकार या उसके संगठनों को डराकर, संभावित रूप से सार्वजनिक अधिकारियों की मृत्यु या चोट पहुंचाकर, सरकारी कार्यों को मजबूर करना, या देश की संरचनाओं को अस्थिर करना। गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 की दूसरी अनुसूची में सूचीबद्ध किसी भी संधि के दायरे में शामिल अधिनियमों को भी शामिल किया गया है। धारा 111(2) के अनुसार, जो कोई भी आतंकवादी कृत्य करने का प्रयास करता है या करता है जिसके परिणामस्वरूप मौत हो जाती है, उसे पैरोल के लाभ के बिना मौत या आजीवन कारावास की सजा दी जाएगी, साथ ही कम से कम ₹10 लाख का जुर्माना भी लगाया जाएगा। ऐसे मामलों में जहां कार्य के परिणामस्वरूप मृत्यु नहीं होती है, तो इसमें शामिल व्यक्ति या व्यक्तियों को कम से कम पांच साल के कारावास की सजा होगी, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है, साथ ही कम से कम ₹5 लाख का जुर्माना भी लगाया जा सकता है। धारा 111(3) से 111(5) किसी आतंकवादी कृत्य से जुड़े अपराधी को सहायता देने, उकसाने, सदस्यता देने या शरण देने के मामलों में लागू दंडों से संबंधित प्रावधान हैं। ऐसी संपत्ति की चोरी जिसका मूल्य पांच हजार रुपये से कम हो प्रस्तावित संहिता की धारा 301 में संपत्ति की चोरी के मामले में सामुदायिक सेवा की सजा का प्रावधान है, जहां चोरी की गई संपत्ति का मूल्य पांच हजार रुपये से कम है। आईपीसी में कोई प्रावधान विशेष रूप से ऐसे छोटे अपराध से संबंधित नहीं है, जिसे अक्सर धारा 378 के तहत चोरी के व्यापक शीर्षक के अंतर्गत रखा गया था। भारत में अपराध के लिए भारत से बाहर उकसाना प्रस्तावित संहिता की धारा 48 भारत के बाहर से भारत के अंदर किसी अपराध को बढ़ावा देने के लिए सजा का प्रावधान करती है। इस प्रकार, नए प्रस्तावित कोड की पहुंच सीमा पार बनाई गई है। छीन नया प्रस्तावित कोड स्नैचिंग को धारा 302 के तहत अपराध के रूप में परिभाषित करने का प्रयास करता है और इस कृत्य के लिए 3 साल तक की कैद और जुर्माने की सजा देता है। कुछ अपराधों के लिए दंड में परिवर्तन मानहानि नए कोड के तहत, मानहानि का अपराध धारा 354(2) के तहत 2 साल तक की कैद या जुर्माना या "सामुदायिक सेवा" के साथ दंडनीय होगा। लापरवाही से मौत का कारण लापरवाही से मौत के लिए सज़ा बढ़ा दी गई है। आईपीसी के तहत, धारा 304ए में जल्दबाजी या लापरवाही से की गई मौत के अपराध के लिए अधिकतम 2 साल की कैद या जुर्माना या दोनों से दंडित किया जाता है। प्रस्तावित संहिता की धारा 104(1) के तहत अधिकतम 7 साल की सजा और जुर्माना है। ज़बरदस्ती वसूली जबरन वसूली की सज़ा भी बढ़ा दी गई है. आईपीसी की धारा 384 के तहत जबरन वसूली के लिए तीन साल तक की कैद की सजा हो सकती है। प्रस्तावित संहिता की धारा 306 के तहत सात साल तक की कैद की सजा हो सकती है. विश्वास का आपराधिक उल्लंघन आईपीसी की धारा 406 के तहत, आपराधिक विश्वासघात पर तीन साल तक की कैद की सजा हो सकती है। प्रस्तावित संहिता की धारा 315 के तहत पांच साल तक की कैद की सजा हो सकती है. लोक सेवक द्वारा विधिवत प्रख्यापित आदेश की अवज्ञा आईपीसी की धारा 188 के तहत, किसी लोक सेवक के आदेशों की अवज्ञा करने पर एक महीने या छह महीने तक की कैद की सजा हो सकती है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसके कृत्य से मानव जीवन, स्वास्थ्य या सुरक्षा को खतरा होता है या दंगा होता है। हालाँकि, प्रस्तावित संहिता की धारा 221 के तहत छह महीने से लेकर एक साल तक की कैद की सजा हो सकती है। शराबी व्यक्ति द्वारा सार्वजनिक स्थान पर दुर्वयवहार आईपीसी की धारा 510 के तहत, सार्वजनिक स्थान पर नशे में धुत व्यक्ति को 24 घंटे तक की साधारण कैद या 10 रुपये के जुर्माने से दंडित किया जा सकता है। लेकिन प्रस्तावित संहिता की धारा 353 के तहत सामुदायिक सेवा या अधिकतम 1,000 रुपये के जुर्माने से भी दंडित किया जा सकता है। निरसित प्रावधान अप्राकृतिक यौन अपराध आईपीसी की धारा 377, जो किसी भी पुरुष, महिला या जानवर के साथ प्रकृति के आदेश के खिलाफ "अप्राकृतिक" शारीरिक संभोग को अपराध मानती थी, नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ 2 के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आंशिक रूप से खारिज कर दिया गया था। इस हद तक कि ऐसा कार्य दो वयस्कों के बीच सहमति से किया जाता है। हालाँकि, नये कानून में अप्राकृतिक अपराधों को शामिल नहीं किया गया है। व्यभिचार व्यभिचार को अपराध मानने वाली आईपीसी की धारा 497 को सुप्रीम कोर्ट ने मनमाना होने और संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन करने के कारण रद्द कर दिया था। नये कानून के तहत व्यभिचार अब अपराध नहीं है। आत्महत्या करके मरने का प्रयास आईपीसी में आत्महत्या करके मरने का प्रयास करने पर सजा का प्रावधान है, जिसके परिणामस्वरूप एक वर्ष तक की कैद, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। हालाँकि नये कानून में इस प्रावधान को हटा दिया है, लेकिन आत्महत्या करके मरने का प्रयास करने के कार्य को पूरी तरह से अपराध से मुक्त नहीं किया गया है। नयी संहिता की धारा 224 के तहत, आत्महत्या करके मरने का प्रयास करने पर अभी भी एक वर्ष तक की कैद, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। इसमें प्रावधान है कि अधिनियम का उद्देश्य किसी लोक सेवक को अपने आधिकारिक कर्तव्य का निर्वहन करने के लिए मजबूर करना या रोकना है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 को बदलने का प्रस्ताव है, जिसमें 533 धाराएं हैं। संहिता सीआरपीसी के 9 प्रावधानों को निरस्त करती है, 107 प्रावधानों में संशोधन का प्रस्ताव करती है और 9 नए प्रावधान पेश करती है। कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन नीचे सूचीबद्ध हैं। नये प्रावधान नामित पुलिस अधिकारी प्रस्तावित संहिता की धारा 37 के तहत, राज्य सरकार प्रत्येक जिले और राज्य स्तर पर एक पुलिस नियंत्रण कक्ष स्थापित करने के लिए बाध्य है, साथ ही एक पुलिस अधिकारी को नामित करेगी जो गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों के नाम और पते और प्रकृति के बारे में जानकारी बनाए रखेगा। आरोपित अपराध का. उद्घोषित अपराधी की पहचान एवं संपत्ति की कुर्की प्रस्तावित संहिता की धारा 86 के तहत, न्यायालय को किसी घोषित व्यक्ति की संपत्ति की पहचान, कुर्की और जब्ती की प्रक्रिया शुरू करने का अधिकार है। ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से तलाशी और जब्ती की रिकॉर्डिंग धारा 105 के तहत नया कोड ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से किसी भी संपत्ति, लेख या चीज़ की खोज और जब्ती की रिकॉर्डिंग का प्रावधान करता है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग आदि के प्रयोजनों के लिए किसी भी संचार उपकरण के उपयोग को शामिल करने के लिए प्रस्तावित कोड के तहत ऑडियो वीडियो इलेक्ट्रॉनिक साधनों को भी परिभाषित किया गया है। किसी अपराध के घटित होने से प्राप्त संपत्ति की कुर्की, ज़ब्ती, या बहाली धारा 107 के अनुसार नए कोड के तहत, यदि पुलिस या मजिस्ट्रेट के पास यह विश्वास करने का कारण है कि कोई संपत्ति (प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से) आपराधिक गतिविधि के परिणामस्वरूप प्राप्त हुई है, तो अदालत ऐसी संपत्ति की कुर्की के लिए ऐसे अपराध का प्रयास कर सकती है। भारत के बाहर देश या स्थान में जांच के लिए अनुरोध धारा 112 में प्रस्तावित नए कोड के तहत, आपराधिक न्यायालयों को जांच अधिकारी के अनुरोध पर किसी अन्य देश की अदालत को पत्र जारी करने का अधिकार दिया गया है, जिसके अनुसार साक्ष्य वहां उपलब्ध हो सकते हैं, किसी भी व्यक्ति की मौखिक जांच करने के लिए जिसे तथ्यों से परिचित होना चाहिए। और उसका बयान दर्ज करें और ऐसे सभी साक्ष्य ऐसे पत्र जारी करने वाले न्यायालय को अग्रेषित करें! भारतीय न्याय संहिता, 2023 भारतीय न्याय संहिता में 356 धाराएँ हैं, जिनमें से 175 धाराएँ भारतीय दंड संहिता से ली गई हैं, जिनमें परिवर्तन और संशोधन हुए हैं, 22 को निरस्त किया गया है, और 8 नई धाराएँ जोड़ी गई हैं। नए कोड में छोटे अपराधों के लिए सजा के एक नए रूप के रूप में "सामुदायिक सेवा" भी पेश की गई है। भाषा परिवर्तन नया कोड ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के तहत परिभाषित पुरुषों, महिलाओं और "ट्रांसजेंडर" को कवर करने के लिए पुरुष सर्वनाम की परिभाषा का विस्तार करता है। मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 के तहत परिभाषित वाक्यांश "मानसिक बीमारी", पागलपन और मानसिक अस्वस्थता के स्थान पर प्रयोग किया जाता है। नए प्रावधान और परिभाषाएँ महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध नए प्रावधानों और अपराधों के साथ महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों से निपटने वाला एक नया अध्याय पेश किया गया है। आईपीसी के तहत, ये अपराध मानव शरीर के खिलाफ अपराधों से संबंधित अध्याय का हिस्सा हैं। आईपीसी के तहत, धारा 376DA और 376DB क्रमशः 16 साल से कम उम्र और 12 साल से कम उम्र की लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार के लिए सजा का प्रावधान करती है। अगर लड़की 16 साल से कम उम्र की है तो सजा आजीवन कारावास है। यदि लड़की 12 वर्ष से कम उम्र की है, तो सजा आजीवन कारावास या मृत्युदंड हो सकती है। हालाँकि, प्रस्तावित संहिता के तहत, धारा 70(2) में प्रावधान है कि यदि व्यक्तियों का एक समूह 18 वर्ष से कम उम्र की किसी भी लड़की के साथ बलात्कार करता है, तो उन्हें आजीवन कारावास या यहाँ तक कि मौत की सज़ा भी हो सकती है। कपटपूर्ण साधनों का उपयोग करके संभोग करना। यह नए कोड में महत्वपूर्ण परिवर्धनों में से एक है। प्रस्तावित संहिता की धारा 69 के तहत, कोई व्यक्ति जो धोखे से या शादी का झूठा आश्वासन देकर किसी महिला के साथ बलात्कार की श्रेणी में नहीं आने वाला यौन संबंध बनाता है, उसे उत्तरदायी होने के अलावा, दस साल तक की कैद की संभावित सजा का सामना करना पड़ेगा। जुर्माने के लिए. इससे पहले, शादी के वादे पर यौन संबंध बनाने को आईपीसी की धारा 375 के तहत बलात्कार के अपराध के रूप में दंडित किया जाता था और उक्त प्रावधान इसे एक अलग अपराध के रूप में सूचीबद्ध नहीं करता था। अपराध करने के लिए 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को काम पर लगाना। प्रस्तावित संहिता के तहत, यदि कोई अपराध करने के लिए 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को काम पर रखता है, तो ऐसे व्यक्ति को बच्चों द्वारा किए गए अपराध के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा। उतावलेपन या लापरवाही से किए गए कार्य से मृत्यु कारित करना और घटना स्थल से भाग जाना प्रस्तावित संहिता की धारा 104(2) ऐसे व्यक्ति के लिए उच्च कारावास से दंडित करने का प्रावधान करती है जो जल्दबाजी या लापरवाही से किए गए कार्य से मौत का कारण बनता है और फिर घटना स्थल से भाग जाता है। ऐसे में अधिकतम सजा 7 साल तक और जुर्माना है. मॉब लिंचिंग अपराध, हालांकि अलग से परिभाषित नहीं है, हत्या के समान प्रावधान के तहत दंडनीय है, अर्थात, धारा 101। प्रस्तावित संहिता की धारा 101 में नस्ल, जाति या समुदाय, लिंग, जन्म स्थान, भाषा, के आधार पर हत्या के लिए सजा का प्रावधान है। व्यक्तिगत विश्वास या 'कोई अन्य आधार'। यह अपराध मृत्युदंड या आजीवन कारावास या सात साल या उससे अधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय है। आईपीसी के तहत, मॉब लिंचिंग को सामान्य इरादे से की गई हत्या के रूप में निपटाया जाता है और तदनुसार दंडित किया जाता है। आईपीसी के तहत, हत्या की सज़ा या तो मौत है या आजीवन कारावास है। हालाँकि, भारतीय न्याय संहिता की धारा 101(2) में आजीवन कारावास और मृत्युदंड के अलावा सात साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है। संगठित अपराध और छोटे संगठित अपराध संगठित अपराध को पहली बार दंड संहिता के तहत परिभाषित किया गया है। प्रस्तावित संहिता की धारा 109(1) संगठित अपराध को निरंतर अवैध गतिविधियों के रूप में परिभाषित करती है, जिसमें अपहरण, डकैती, वाहन चोरी, जबरन वसूली, भूमि पर कब्जा करना, अनुबंध हत्या आदि शामिल हैं, जो व्यक्तियों के समूहों द्वारा अकेले या संयुक्त रूप से किए जाते हैं। हिंसा, धमकी, धमकी या अन्य गैरकानूनी तरीकों का उपयोग करके वित्तीय या भौतिक लाभ प्राप्त करना। धारा 109(2) के अनुसार, जो कोई भी संगठित अपराध करने का प्रयास करेगा या करेगा जिसके परिणामस्वरूप मृत्यु होगी, उसे मृत्युदंड या आजीवन कारावास की सजा के साथ-साथ कम से कम ₹10 लाख का जुर्माना लगाया जाएगा। ऐसे मामलों में जहां कार्य के परिणामस्वरूप मृत्यु नहीं होती है, तो इसमें शामिल व्यक्ति या व्यक्तियों को कम से कम पांच साल के कारावास की सजा होगी, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है, साथ ही कम से कम ₹5 लाख का जुर्माना भी लगाया जा सकता है। धारा 109(3) से 109(7) में संगठित अपराध से जुड़ी सहायता करने, उकसाने, सदस्यता लेने, अपराधी को शरण देने या संपत्ति रखने पर लागू दंडों का विवरण देने वाले प्रावधान शामिल हैं। धारा 110 छोटे संगठित अपराधों को वाहनों की चोरी या वाहनों से चोरी, घरेलू और व्यावसायिक चोरी, चाल चोरी, कार्गो अपराध, स्नैचिंग, दुकान से चोरी, एटीएम चोरी और सार्वजनिक परीक्षा प्रश्न पत्रों की बिक्री के रूप में परिभाषित करती है। जो कोई भी छोटे-मोटे संगठित अपराध करने का प्रयास करेगा या करेगा, उसे कम से कम एक साल की कैद होगी, जिसे सात साल तक बढ़ाया जा सकता है। आतंकवादी अधिनियम एक और पहली बार, प्रस्तावित कोड के तहत एक 'आतंकवादी कृत्य' को परिभाषित किया गया है। धारा 111(1) के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर भारत की एकता, अखंडता और सुरक्षा को खतरे में डालने वाली किसी कार्रवाई में शामिल होता है, तो उसे आतंकवादी कृत्य माना जाता है: भय पैदा करने, मृत्यु का कारण बनने, व्यक्तियों को नुकसान पहुँचाने या जीवन को खतरे में डालने के लिए घातक साधनों का उपयोग करना। सार्वजनिक या निजी संपत्ति को क्षति या व्यवधान उत्पन्न करके। महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाकर या नष्ट करके, महत्वपूर्ण प्रणालियों को बाधित करके। सरकार या उसके संगठनों को डराकर, संभावित रूप से सार्वजनिक अधिकारियों की मृत्यु या चोट पहुंचाकर, सरकारी कार्यों को मजबूर करना, या देश की संरचनाओं को अस्थिर करना। गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 की दूसरी अनुसूची में सूचीबद्ध किसी भी संधि के दायरे में शामिल अधिनियमों को भी शामिल किया गया है। धारा 111(2) के अनुसार, जो कोई भी आतंकवादी कृत्य करने का प्रयास करता है या करता है जिसके परिणामस्वरूप मौत हो जाती है, उसे पैरोल के लाभ के बिना मौत या आजीवन कारावास की सजा दी जाएगी, साथ ही कम से कम ₹10 लाख का जुर्माना भी लगाया जाएगा। ऐसे मामलों में जहां कार्य के परिणामस्वरूप मृत्यु नहीं होती है, तो इसमें शामिल व्यक्ति या व्यक्तियों को कम से कम पांच साल के कारावास की सजा होगी, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है, साथ ही कम से कम ₹5 लाख का जुर्माना भी लगाया जा सकता है। धारा 111(3) से 111(5) किसी आतंकवादी कृत्य से जुड़े अपराधी को सहायता देने, उकसाने, सदस्यता देने या शरण देने के मामलों में लागू दंडों से संबंधित प्रावधान हैं। ऐसी संपत्ति की चोरी जिसका मूल्य पांच हजार रुपये से कम हो प्रस्तावित संहिता की धारा 301 में संपत्ति की चोरी के मामले में सामुदायिक सेवा की सजा का प्रावधान है, जहां चोरी की गई संपत्ति का मूल्य पांच हजार रुपये से कम है। आईपीसी में कोई प्रावधान विशेष रूप से ऐसे छोटे अपराध से संबंधित नहीं है, जिसे अक्सर धारा 378 के तहत चोरी के व्यापक शीर्षक के अंतर्गत रखा गया था। भारत में अपराध के लिए भारत से बाहर उकसाना इस संहिता की धारा 48 भारत के बाहर से भारत के अंदर किसी अपराध को बढ़ावा देने के लिए सजा का प्रावधान करती है। इस प्रकार, नए कोड की पहुंच सीमा पार बनाई गई है। छीन नया प्रस्तावित कोड स्नैचिंग को धारा 302 के तहत अपराध के रूप में परिभाषित करने का प्रयास करता है और इस कृत्य के लिए 3 साल तक की कैद और जुर्माने की सजा देता है। कुछ अपराधों के लिए दंड में परिवर्तन मानहानि नए कोड के तहत, मानहानि का अपराध धारा 354(2) के तहत 2 साल तक की कैद या जुर्माना या "सामुदायिक सेवा" के साथ दंडनीय होगा। लापरवाही से मौत का कारण लापरवाही से मौत के लिए सज़ा बढ़ा दी गई है। आईपीसी के तहत, धारा 304ए में जल्दबाजी या लापरवाही से की गई मौत के अपराध के लिए अधिकतम 2 साल की कैद या जुर्माना या दोनों से दंडित किया जाता है। इस संहिता की धारा 104(1) के तहत अधिकतम 7 साल की सजा और जुर्माना है। ज़बरदस्ती वसूली जबरन वसूली की सज़ा भी बढ़ा दी गई है. आईपीसी की धारा 384 के तहत जबरन वसूली के लिए तीन साल तक की कैद की सजा हो सकती है। प्रस्तावित संहिता की धारा 306 के तहत सात साल तक की कैद की सजा हो सकती है. विश्वास का आपराधिक उल्लंघन आईपीसी की धारा 406 के तहत, आपराधिक विश्वासघात पर तीन साल तक की कैद की सजा हो सकती है। प्रस्तावित संहिता की धारा 315 के तहत पांच साल तक की कैद की सजा हो सकती है. लोक सेवक द्वारा विधिवत प्रख्यापित आदेश की अवज्ञा आईपीसी की धारा 188 के तहत, किसी लोक सेवक के आदेशों की अवज्ञा करने पर एक महीने या छह महीने तक की कैद की सजा हो सकती है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसके कृत्य से मानव जीवन, स्वास्थ्य या सुरक्षा को खतरा होता है या दंगा होता है। हालाँकि, प्रस्तावित संहिता की धारा 221 के तहत छह महीने से लेकर एक साल तक की कैद की सजा हो सकती है। शराबी व्यक्ति द्वारा सार्वजनिक स्थान पर दुव्र्यवहार आईपीसी की धारा 510 के तहत, सार्वजनिक स्थान पर नशे में धुत व्यक्ति को 24 घंटे तक की साधारण कैद या 10 रुपये के जुर्माने से दंडित किया जा सकता है। लेकिन नयी संहिता की धारा 353 के तहत सामुदायिक सेवा या अधिकतम 1,000 रुपये के जुर्माने से भी दंडित किया जा सकता है। निरसित प्रावधान अप्राकृतिक यौन अपराध आईपीसी की धारा 377, जो किसी भी पुरुष, महिला या जानवर के साथ प्रकृति के आदेश के खिलाफ "अप्राकृतिक" शारीरिक संभोग को अपराध मानती थी, नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ 2 के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आंशिक रूप से खारिज कर दिया गया था। इस हद तक कि ऐसा कार्य दो वयस्कों के बीच सहमति से किया जाता है। हालाँकि, नयी संहिता में अप्राकृतिक अपराधों को शामिल नहीं किया गया है। व्यभिचार व्यभिचार को अपराध मानने वाली आईपीसी की धारा 497 को सुप्रीम कोर्ट ने मनमाना होने और संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन करने के कारण रद्द कर दिया था। नयी संहिता के तहत व्यभिचार अब अपराध नहीं है। आत्महत्या करके मरने का प्रयास आईपीसी में आत्महत्या करके मरने का प्रयास करने पर सजा का प्रावधान है, जिसके परिणामस्वरूप एक वर्ष तक की कैद, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। हालाँकि नयी संहिता में इस प्रावधान को हटा दिया गया है, लेकिन आत्महत्या करके मरने का प्रयास करने के कार्य को पूरी तरह से अपराध से मुक्त नहीं किया गया है। प्रस्तावित संहिता की धारा 224 के तहत, आत्महत्या करके मरने का प्रयास करने पर अभी भी एक वर्ष तक की कैद, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। इसमें प्रावधान है कि अधिनियम का उद्देश्य किसी लोक सेवक को अपने आधिकारिक कर्तव्य का निर्वहन करने के लिए मजबूर करना या रोकना है। प्रारूपण त्रुटियाँ धारा 23 प्रस्तावित संहिता की धारा 23 आईपीसी की धारा 85 को प्रतिस्थापित करने के लिए है, जिसमें कहा गया है कि यदि किसी व्यक्ति को अनजाने में कोई नशीला पदार्थ दिया गया है, तो नशे की हालत में उसके द्वारा किया गया कोई भी कार्य अपराध नहीं माना जाएगा। हालाँकि, नयी संहिता की धारा 23 में कहा गया है कि जब तक किसी व्यक्ति को अनजाने में कोई नशीला पदार्थ नहीं दिया जाता है, तब तक उसके द्वारा नशे के प्रभाव में किया गया कोई भी कार्य अपराध नहीं माना जाएगा। धारा 150 धारा 150 की व्याख्या, जो "भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्यों" को दंडित करती है, अधूरी है। स्पष्टीकरण इस प्रकार है: "इस अनुभाग में निर्दिष्ट गतिविधियों को उत्तेजित करने या उत्तेजित करने का प्रयास किए बिना कानूनी तरीकों से उनमें परिवर्तन प्राप्त करने की दृष्टि से सरकार के उपायों, या प्रशासनिक या अन्य कार्रवाई की अस्वीकृति व्यक्त करने वाली टिप्पणियाँ।" भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 का स्थान ले रहा है, जिसमें 533 धाराएं हैं। संहिता सीआरपीसी के 9 प्रावधानों को निरस्त करती है, 107 प्रावधानों में संशोधन किया गया है और 9 नए प्रावधान जोड़े गए है। कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन नीचे सूचीबद्ध हैं। नये प्रावधान* नामित पुलिस अधिकारी नयी संहिता की धारा 37 के तहत, राज्य सरकार प्रत्येक जिले और राज्य स्तर पर एक पुलिस नियंत्रण कक्ष स्थापित करने के लिए बाध्य है, साथ ही एक पुलिस अधिकारी को नामित करेगी जो गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों के नाम और पते और प्रकृति के बारे में जानकारी बनाए रखेगा। आरोपित अपराध का. उद्घोषित अपराधी की पहचान एवं संपत्ति की कुर्की संहिता की धारा 86 के तहत, न्यायालय को किसी घोषित व्यक्ति की संपत्ति की पहचान, कुर्की और जब्ती की प्रक्रिया शुरू करने का अधिकार है। ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से तलाशी और जब्ती की रिकॉर्डिंग* धारा 105 के तहत नया कोड ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से किसी भी संपत्ति, लेख या चीज़ की खोज और जब्ती की रिकॉर्डिंग का प्रावधान करता है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग आदि के प्रयोजनों के लिए किसी भी संचार उपकरण के उपयोग को शामिल करने के लिए संहिता के तहत ऑडियो वीडियो इलेक्ट्रॉनिक साधनों को भी परिभाषित किया गया है। किसी अपराध के घटित होने से प्राप्त संपत्ति की कुर्की, ज़ब्ती, या बहाली धारा 107 के अनुसार नए कोड के तहत, यदि पुलिस या मजिस्ट्रेट के पास यह विश्वास करने का कारण है कि कोई संपत्ति (प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से) आपराधिक गतिविधि के परिणामस्वरूप प्राप्त हुई है, तो अदालत ऐसी संपत्ति की कुर्की के लिए ऐसे अपराध का प्रयास कर सकती है। भारत के बाहर देश या स्थान में जांच के लिए अनुरोध धारा 112 में नए कोड के तहत, आपराधिक न्यायालयों को जांच अधिकारी के अनुरोध पर किसी अन्य देश की अदालत को पत्र जारी करने का अधिकार दिया गया है, जिसके अनुसार साक्ष्य वहां उपलब्ध हो सकते हैं, किसी भी व्यक्ति की मौखिक जांच करने के लिए जिसे तथ्यों से परिचित होना चाहिए। और उसका बयान दर्ज करें और ऐसे सभी साक्ष्य ऐसे पत्र जारी करने वाले न्यायालय को अग्रेषित करें। इसी प्रकार, राष्ट्रों के समुदाय के सिद्धांत के सम्मान में, नए कोड की धारा 113 भारत में किसी भी व्यक्ति की जांच के लिए किसी अन्य देश से अनुरोध पत्र पर विचार करने की प्रक्रिया प्रदान करती है और ऐसा पत्र प्राप्त होने पर, केंद्र सरकार उसे इसे न्यायिक मजिस्ट्रेट को अग्रेषित करने का अधिकार है जो उस व्यक्ति को बुलाएगा और उसका बयान दर्ज करेगा। अनुपस्थिति में परीक्षण नई संहिता की धारा 356 किसी घोषित अपराधी की अनुपस्थिति में मुकदमा चलाने और निर्णय पारित करने की प्रक्रिया प्रदान करने का प्रावधान करती है। धारा एक गैर-अस्थिर खंड से शुरू होती है और निर्धारित करती है कि एक घोषित अपराधी को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने और मुकदमा चलाने के अपने अधिकार को छोड़ने के लिए समझा जाएगा, और अदालत मुकदमे को इस तरह से आगे बढ़ा सकती है जैसे कि वह उपस्थित हो और निर्णय सुनाए। गवाह संरक्षण योजना नया कोड प्रत्येक राज्य सरकार के लिए गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए राज्य के लिए एक गवाह संरक्षण योजना तैयार करना और अधिसूचित करना अनिवार्य बनाता है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में ट्रायल प्रौद्योगिकी का उपयोग करते हुए और आपराधिक परीक्षणों के दौरान इसके उपयोग को मंजूरी देते हुए, नए कोड में इलेक्ट्रॉनिक संचार या ऑडियो के उपयोग के माध्यम से कोड के तहत परीक्षणों, कार्यवाही और पूछताछ को इलेक्ट्रॉनिक मोड में आयोजित करने की अनुमति देने की भी मांग की गई है। -वीडियो इलेक्ट्रॉनिक साधन. पुलिस द्वारा पीड़ित को एफआईआर की ई-फाइलिंग और जांच की प्रगति के बारे में सूचित किया जाएगा नए कोड की धारा 173 के अनुसार, संज्ञेय अपराध के संबंध में एफआईआर किसी पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी को मौखिक या इलेक्ट्रॉनिक संचार द्वारा दी जा सकती है। धारा 193(3)(ii) पुलिस अधिकारी को 90 दिनों के भीतर जांच की प्रगति के बारे में मुखबिर या पीड़ित को सूचित करने का आदेश देती है। समयबद्ध जांच और निर्णय सुनाने के लिए विशिष्ट समयसीमा निर्धारित की गई है नए कोड में पुलिस अधिकारी को कार्यवाही की एक डायरी रखने का आदेश दिया गया है, जिसमें उस तक सूचना पहुंचने का समय और जांच शुरू करने और बंद करने का समय बताना होगा। धारा 193 के तहत, नया कोड यह भी कहता है कि हर जांच को अनावश्यक देरी के बिना पूरा किया जाना चाहिए और महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों, यानी बलात्कार, सामूहिक बलात्कार और POCSO अधिनियम के तहत जांच को उस तारीख से 2 महीने के भीतर पूरा किया जाना चाहिए जिस दिन पुलिस ने मामला दर्ज किया था। फैसला सुनाने की अवधि नया कोड धारा 258 के तहत अदालत को बहस पूरी होने की तारीख से 30 दिनों के भीतर फैसला सुनाने का आदेश देता है, जिसे विशिष्ट कारणों से 60 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है। पुलिस हिरासत अवधि के संबंध में स्पष्टीकरण नया कोड पुलिस हिरासत अवधि के संबंध में महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण भी प्रदान करता है। प्रस्तावित नए आपराधिक कोड की धारा 187(2), जो सीआरपीसी की धारा 167(2) के प्रावधान को प्रतिबिंबित करती है, यह स्पष्ट करने का प्रयास करती है कि पॉलिसी हिरासत अवधि की 15 दिन की अवधि या तो पूरी तरह से या आंशिक रूप से हो सकती है। यौन अपराध तस्करी सहित अपराधों में लोक सेवकों पर मुकदमा चलाने के लिए किसी मंजूरी की आवश्यकता नहीं है धारा 218 के प्रावधान ने बलात्कार और तस्करी के अपराधों के लिए एक लोक सेवक पर मुकदमा चलाने के लिए मंजूरी प्राप्त करने की आवश्यकता को समाप्त कर दिया है। भारतीय साक्ष्य संहिता 2023 भारतीय साक्ष्य संहिता 2023, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 को प्रतिस्थापित करेगी और इसमें 170 प्रावधान हैं। नयी संहिता इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को सुव्यवस्थित करने का प्रयास करता है। नयी संहिता की मुख्य बातें इस प्रकार हैं: साक्ष्य इलेक्ट्रॉनिक रूप से दिया जा सकता है नयी संहिता साक्ष्य की परिभाषा को विस्तृत करने का प्रयास करता है। धारा 2(1)(ई) के अनुसार, साक्ष्य में इलेक्ट्रॉनिक रूप से दिया गया कोई भी बयान या जानकारी शामिल है, और यह गवाहों, आरोपियों, विशेषज्ञों और पीड़ितों को उनके साक्ष्य की रिकॉर्डिंग के लिए अदालत के समक्ष इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से उपस्थित होने की अनुमति देगा। द्वितीयक साक्ष्य नये संहिता में द्वितीयक साक्ष्य के दायरे का विस्तार है। धारा 58 के तहत विधेयक मौखिक स्वीकारोक्ति, लिखित स्वीकारोक्ति और दस्तावेज़ की जांच करने वाले व्यक्ति के साक्ष्य को द्वितीयक साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत करने की अनुमति देता है। इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को सुव्यवस्थित करना नयी संहिता इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य प्रमाणपत्रों को अधिक सार्थक बनाने और मूल रिकॉर्ड के हैश मूल्य प्रदान करने के लिए एक नया कार्यक्रम पेश करता है। धारा 2(1)(सी) के तहत दस्तावेजों के रूप में इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल रिकॉर्ड को शामिल करने के लिए दस्तावेज़ शब्द की परिभाषा का भी विस्तार किया गया है। नये संहिता में धारा 61 के तहत यह भी स्पष्ट करता है कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड या डिजिटल रिकॉर्ड का कानूनी प्रभाव, वैधता और प्रवर्तनीयता समान होगी और इसे किसी भी अन्य दस्तावेज़ की तरह "प्राथमिक साक्ष्य" या "द्वितीयक साक्ष्य" के माध्यम से साबित किया जा सकता है। ऐसे तथ्य जिन पर न्यायालय न्यायिक संज्ञान ले सकता है अंततः, आईईए की धारा 57 में बहुप्रतीक्षित परिवर्तन (जो उन विशिष्ट तथ्यों को प्रदान करता है जिनके बारे में न्यायालय न्यायिक नोटिस ले सकता है) को नए संहिता की धारा 52 के माध्यम से स्वरूप दिया गया है। धारा 57, जो ब्रिटिश राज के दौरान तैयार की गई थी, मुख्य रूप से ऐसे तथ्यों को सूचीबद्ध करती है जो ब्रिटेन की संसद से संबंधित हैं, प्रावधान को संशोधित करते हुए, नयी संहिता स्पष्ट रूप से और सुसंगत रूप से भारत के बारे में ऐसे तथ्यों को सूचीबद्ध करता है, जिन पर न्यायालय न्यायिक नोटिस ले सकता है। पुलिसकर्मियों और अभियोजकों को मिल रही ट्रेनिंग उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार जुलाई के पहले देशभर के पुलिस कर्मियों, अभियोजकों और जेल कर्मियों के प्रशिक्षण का काम पूरा कर लिया जाएगा। इसके लिए तीन हजार प्रशिक्षकों के प्रशिक्षण का काम पूरा किया जा चुका है। इसी तरह से ट्रायल कोर्ट के जजों के प्रशिक्षण का काम भी चल रहा है।
प्रस्तुतकर्ता: अरुण कुमार गुप्त अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता इलाहाबाद उच्च न्यायालय

Sunday, March 3, 2024

दीवानी और फौजदारी ट्रायल पर हाईकोर्ट के स्थगन आदेश स्वत: निरस्त नहीं होते: सुप्रीम कोर्ट ने 'एशियन रिसरफेसिंग' फैसला रद्द किया

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (29 फरवरी) को अपने 2018 एशियन रिसरफेसिंग फैसला रद्द कर दिया। उक्त फैसले में हाईकोर्ट द्वारा नागरिक और आपराधिक मामलों में सुनवाई पर रोक लगाने वाले अंतरिम आदेशों को आदेश की तारीख से छह महीने के बाद स्वचालित रूप से समाप्त कर दिया जाएगा, जब तक कि हाईकोर्ट द्वारा स्पष्ट रूप से बढ़ाया गया। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अभय एस ओक, जस्टिस जेबी पारदीवाला, जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस मनोज मिश्रा की पांच-जजों की पीठ द्वारा नवीनतम फैसला, पहले के फैसले को रद्द करते हुए दिया गया।
जस्टिस ओक ने फैसला पढ़ते हुए कहा कि पीठ एशियन रिसर्फेसिंग के निर्देशों से सहमत नहीं है। न्यायालय ने कहा, "संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए यह निर्देश जारी नहीं किया जा सकता कि हाईकोर्ट द्वारा पारित सभी अंतरिम आदेश समय बीतने पर स्वचालित रूप से समाप्त हो जाएंगे।" 5-जजों की पीठ ने यह भी कहा कि संवैधानिक अदालतों को किसी भी अन्य अदालतों के समक्ष लंबित मामलों के लिए समयबद्ध कार्यक्रम निर्धारित करने से बचना चाहिए। हाईकोर्ट सहित प्रत्येक अदालत में मामलों के लंबित होने का पैटर्न अलग-अलग है और कुछ मामलों के लिए आउट-ऑफ़-टर्न प्राथमिकता देना संबंधित जज पर छोड़ देना सबसे अच्छा है, जो अदालत की जमीनी स्थिति से अवगत है।
जस्टिस ओक ने कहा कि फैसले में संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों के प्रयोग पर कुछ दिशानिर्देश हैं। जस्टिस मनोज मिश्रा ने सहमति वाला फैसला लिखा। पांच-जजों की पीठ ने 13 दिसंबर को अपना फैसला सुरक्षित रखने से पहले पिछले साल एशियन रिसर्फेसिंग ऑफ रोड एजेंसी बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो में मार्च 2018 के फैसले के खिलाफ संदर्भ पर सुनवाई की थी। यह इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील से उपजा था, जिसने 'स्वचालित स्थगन अवकाश नियम और सुप्रीम कोर्ट के विचार के लिए कानून के दस प्रश्न तैयार करने पर संदेह जताया था।
सीजेआई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पांच-जजों की पीठ ने स्थगन आदेशों के स्वत: निरस्त होने से उत्पन्न होने वाले दो महत्वपूर्ण मुद्दों पर प्रकाश डाला। सबसे पहले, उन्होंने कहा कि यह तंत्र वादियों की परिस्थितियों या आचरण पर विचार किए बिना उन पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। दूसरा, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि स्थगन आदेश को हटाना न्यायिक कार्य है, प्रशासनिक नहीं, इसलिए न्यायिक विवेक के विचारशील अनुप्रयोग की आवश्यकता है।

हाईकोर्ट बार एसोसिएशन, इलाहाबाद, जिसने इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष मामले में हस्तक्षेप किया था, का प्रतिनिधित्व कर रहे सीनियर एडवोकेट राकेश द्विवेदी ने स्थगन आदेशों के स्वत: निरस्त होने के खिलाफ तर्क दिया। उन्होंने संवैधानिक ढांचे, विशेष रूप से अनुच्छेद 226, जो हाईकोर्ट को रिट जारी करने का अधिकार देता है, उसके साथ संभावित हस्तक्षेप के बारे में चिंता जताई। सीनियर वकील ने विभिन्न प्रकार के मामलों के लिए सूक्ष्म दृष्टिकोण की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए विस्तार पर विचार करने के लिए विशेष पीठों के निर्माण का सुझाव दिया।
इसी तरह, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस बात पर जोर दिया कि हाईकोर्ट के न्यायिक विवेक को व्यापक निर्देश द्वारा कम नहीं किया जाना चाहिए। कानून अधिकारी ने स्थगन आदेशों की अवधि तय करने में अदालतों को अपने विवेक को बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया, ऐसे उदाहरणों पर प्रकाश डाला जहां स्वचालित अवकाश निर्देशों के कारण स्थगन आदेश जारी होने के छह महीने बाद सुनवाई फिर से शुरू नहीं करने पर न्यायाधीशों के खिलाफ अवमानना के मामले सामने आए। कानूनी दलीलें 2018 के फैसले के व्यापक निहितार्थों पर भी प्रकाश डालती हैं। सीनियर एडवोकेट विजय हंसारिया और एडवोकेट अमित पई ने न्यायिक विवेक के क्षरण और मनमाने परिणामों की संभावना के बारे में चिंता व्यक्त की। उन्होंने न्याय और निष्पक्ष निर्णय के बुनियादी सिद्धांतों के साथ त्वरित सुनवाई की अनिवार्यता को संतुलित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
वाद शीर्षक- हाई कोर्ट बार एसोसिएशन इलाहाबाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य। | 
आपराधिक अपील संख्या 3589 सन 2023


Saturday, March 2, 2024

Matter Referred to Hon'ble Chief Justice urgently for constitution of Larger Bench.

Order XXIII. Rule 1-Suit- Withdrawal of-Acceptance of application for-Court respectfully disagreeing with view expressed in Meera Rai's case referred the matter for consideration by Larger Bench with following questions of law-(i) Whether decision of this High Court in Raisa Sultana Begum, AIR 1996 All 318 holding that application under Order XXII, Rule 1 of C.P.C. once moved, leads to withdrawal of suit ipso facto without court passing affirmative order is still good law in view of subsequent decision of Full Bench in Sunni Central Board v. Sri Gopal Singh Visharad, 2010 ADJ 1 (SFB) (LB) and Supreme Court in M. Siddiq (Dead) through Legal representatives (Ram Janmbhoomi Temple case) v. Mahant Suresh Das and others, (2020) 1 SCC 1 and Anurag Mittal v. Shally Mishra Mittal, (2018) 9 SCC 691 (ii) Whether decision in Meera Rai v. Additional Sessions Judge and others, 2017 (12) ADJ 817 does not lay down law correctly in view of law laid down by Supreme Court in Anurag Mittal v. Shaily Mishra Mittal, (2018) 9 SCC 691 on issue if mere lodging of application to unconditionally withdraw suit under Order XXIII, Rule 1 of C.P.C. operates as withdrawal of suit ipso facto and without any affirmative order ?-In view of order of Supreme Court in Misc. Application No. 315 of 2022 in Special Leave Petition (C) No. 6526 of 2020, dated 28.2.2022 Registry was directed to place matter before this Lordship the Hon'ble Chief Justice urgently for constitution of Larger Bench. 

हस्तलेख परीक्षण के लिये मूल दस्तावेज आवश्यक - इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला देते हुए कहा दस्तावेज़ की केवल फोटो-कॉपी होने पर हस्ताक्षरों की फोरेंसिक अथवा हस्तलेखन विशेष...