पति यदि शुरुआती चरण में ही ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर पत्नी के व्यभिचार को प्रथमदृष्टया साबित कर देता है, तो दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125(4) के तहत पत्नी को अंतरिम गुज़ारा-भत्ता देने से इनकार किया जा सकता है। यह महत्वपूर्ण टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने अपने हालिया फैसले में की।
मामले में पति ने दावा किया कि पत्नी के एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर के कारण वह धारा 125(4)दंड प्रक्रिया संहिता के तहत किसी भी प्रकार के गुज़ारा-भत्ते की हकदार नहीं है और इसके समर्थन में तस्वीरें एवं अन्य साक्ष्य भी पेश किए। हालांकि, ट्रायल कोर्ट और बाद में हाईकोर्ट ने यह कहते हुए पति की आपत्ति खारिज कर दी कि ऐसे मुद्दे पर विचार केवल अंतिम सुनवाई के समय किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों अदालतों के आदेशों को रद्द करते हुए कहा कि यदि पति प्रारंभिक स्तर पर ही पर्याप्त साक्ष्यों से अपना दावा प्रथमदृष्टया स्थापित कर देता है, तो अदालत अंतरिम गुज़ारा-भत्ते पर निर्णय लेते समय धारा 125(4) की आपत्ति पर भी विचार कर सकती है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि निचली अदालतों का यह मानना कि ऐसे प्रश्न पर केवल अंतिम निर्णय के समय ही विचार किया जा सकता है, कानून के उद्देश्य के विपरीत है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को पुनः ट्रायल कोर्ट भेज दिया ताकि पति की आपत्ति पर गुण-दोष के आधार पर निर्णय लिया जा सके।
No comments:
Post a Comment