Monday, June 22, 2026

बार एसोसिएशन को वकीलों के प्रैक्टिस करने के अधिकार पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई नियामक नियंत्रण नहीं दिया जा सकता- तेलंगाना हाई कोर्ट

एक महत्वपूर्ण फैसले में तेलंगाना हाईकोर्ट की जस्टिस एन. तुकारामजी की सिंगल जज बेंच ने स्पष्ट किया है कि वकीलों के लिए बार एसोसिएशन की सदस्यता अनिवार्य नहीं बनाई जा सकती और केवल सदस्यता न लेने के आधार पर किसी अधिवक्ता को कानून की प्रैक्टिस करने से रोका या अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। यह फैसला विजय गोपाल बनाम बार कौंसिल ऑफ इंडिया व अन्य मामले में दिया गया।

कोर्ट ने 'Bar Council of India Certificate and Place of Practice (Verification) Rules, 2015' के नियम 6 की सीमित व्याख्या करते हुए कहा कि इस प्रावधान को इस प्रकार लागू नहीं किया जा सकता कि बार एसोसिएशन की सदस्यता अनिवार्य हो जाए या वकीलों के प्रैक्टिस करने के अधिकार पर गैर-वैधानिक संस्थाओं का नियंत्रण स्थापित हो। अदालत ने कहा कि ऐसी कोई भी व्याख्या Advocates Act, 1961 की सीमाओं से बाहर होगी और संविधान के अनुच्छेद 19(1)(c) तथा 19(1)(g) के तहत प्राप्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन मानी जाएगी।

यह मामला अधिवक्ता विजय गोपाल द्वारा दायर याचिका से संबंधित था, जिसमें नियम 6 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए कहा गया था कि नामांकित अधिवक्ता को अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 22, 30 और 33 के तहत प्राप्त प्रैक्टिस के वैधानिक अधिकार को किसी बार एसोसिएशन की सदस्यता से नहीं जोड़ा जा सकता। याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया था कि किसी संगठन की सदस्यता के लिए बाध्य करना संविधान द्वारा प्रदत्त संघ बनाने या न बनाने की स्वतंत्रता का अतिक्रमण है।

सुनवाई के दौरान बार काउंसिल ऑफ इंडिया और तेलंगाना बार काउंसिल ने कहा कि नियम 6 का उद्देश्य वास्तविक अधिवक्ताओं की पहचान करना तथा कल्याणकारी योजनाओं का लाभ सुनिश्चित करना है। कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि नियम 6 केवल एक विकल्प प्रदान करता है और इसे अनिवार्य सदस्यता के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बार एसोसिएशन को वकीलों के प्रैक्टिस करने के अधिकार पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई नियामक नियंत्रण नहीं दिया जा सकता।

इसके साथ ही कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को निर्देश दिया कि वह सभी राज्य बार काउंसिलों को उचित स्पष्टीकरण जारी करे, ताकि प्रमाणन और सत्यापन की प्रक्रिया केवल कल्याणकारी और प्रशासनिक उद्देश्यों तक सीमित रहे तथा इसे वकालत के अधिकार पर बाध्यकारी शर्त के रूप में लागू नहीं किया जाए।

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