दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस एक्ट, 2012 के तहत चार साल की बच्ची पर गंभीर पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट के लिए एक स्कूल कैब ड्राइवर की सज़ा को सही ठहराया है। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई बच्चा गवाह लंबे समय बाद भी कोर्ट में आरोपी की पहचान नहीं कर पाता है, तो इससे प्रॉसिक्यूशन का केस खत्म नहीं होता, बशर्ते रिकॉर्ड में मौजूद दूसरे सबूतों से पहचान अलग से और पक्के तौर पर साबित हो जाए। कोर्ट ने आगे कहा कि ट्रायल कोर्ट का यह न बताना कि एक ही लेन-देन से जुड़े कई अपराधों के लिए दी गई सज़ाएँ एक साथ चलेंगी या एक के बाद एक, न्यायिक अधिकार का गलत इस्तेमाल है, जिसे सिर्फ़ जेल अधिकारियों के फ़ैसले पर नहीं छोड़ा जा सकता, और इस मामले में पंद्रह साल की कुल एक के बाद एक सज़ाएँ CrPC के सेक्शन 31 के नियम का उल्लंघन करेंगी।
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