Tuesday, February 3, 2026

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने POCSO अधिनियम के अंतर्गत की गयी कार्यवाही रदद् की, संबंधित न्यायिक अधिकारी व अभियोजक को कारण बताओ नोटिस किया जारी

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने POCSO अधिनियम के तहत एक व्यक्ति की सजा को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि ट्रायल कोर्ट ने इस तथ्य को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया कि पीड़िता एक सहमति से संबंध में रहने वाली वयस्क (कंसेंटिंग एडल्ट) थी। इस मामले में न्यायालय ने यह भी पाया कि विशेष न्यायाधीश द्वारा की गई गंभीर चूक के कारण अभियुक्त को तीन वर्षों से अधिक समय तक जेल में रखा गया, जो न्याय के साथ अन्याय है।

यह मामला जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस रामकुमार चौबे की खंडपीठ के समक्ष आया। कोर्ट ने विशेष न्यायाधीश और लोक अभियोजक को कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) जारी करते हुए कहा—

“हम संबंधित विशेष न्यायाधीश और लोक अभियोजक को नोटिस जारी करने का प्रस्ताव रखते हैं, क्योंकि उन्होंने यह नजरअंदाज करते हुए कि पीड़िता एक सहमत वयस्क थी, अभियुक्त को तीन वर्षों से अधिक समय तक जेल में रखा। यह विशेष न्यायाधीश की ओर से बौद्धिक बेईमानी का संकेत है। रजिस्ट्री को निर्देश दिया जाता है कि वे विशेष न्यायाधीश और लोक अभियोजक को नोटिस जारी कर उनसे स्पष्टीकरण मांगे।”

इस मामले में आरोपी को धारा 366 IPC (अपहरण) और POCSO अधिनियम की धारा 5 व 6 (गंभीर यौन उत्पीड़न) के तहत दोषी ठहराया गया था, जिसे उसने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

अभियोजन के अनुसार, पीड़िता की मां ने 31 जनवरी 2022 को शिकायत दर्ज कराई थी कि उसकी बेटी लापता हो गई है। बाद में पीड़िता को 23 अप्रैल 2022 को बरामद किया गया और उसका बयान धारा 164 CrPC के तहत दर्ज किया गया। उसका चिकित्सीय परीक्षण भी कराया गया।

अपीलकर्ता की ओर से यह दलील दी गई कि डॉक्टर की गवाही में पीड़िता की उम्र निर्धारित करने के लिए एक्स-रे कराने की सिफारिश की गई थी, और एक्स-रे रिपोर्ट के अनुसार पीड़िता की उम्र 18 वर्ष से अधिक पाई गई थी। इसके बावजूद, न तो लोक अभियोजक ने उस एक्स-रे रिपोर्ट को रिकॉर्ड में प्रदर्शित किया और न ही ट्रायल कोर्ट ने उस पर विचार किया। यह भी कहा गया कि विशेष न्यायाधीश ने धारा 311 CrPC के तहत अपने अधिकार का प्रयोग नहीं किया, जिसके तहत अदालत किसी भी महत्वपूर्ण गवाह को बुला सकती है।

हाईकोर्ट ने कहा कि जब पीड़िता 18 वर्ष से अधिक थी, तब केवल यह प्रश्न विचारणीय था कि वह सहमति से आरोपी के साथ थी या नहीं।

कोर्ट ने Lallusingh S/o Jagdishsingh Samgar बनाम राज्य (1996 MPLJ 452) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई दस्तावेज रिकॉर्ड पर उपलब्ध है, तो आरोपी उसका लाभ ले सकता है, भले ही उसने उसे औपचारिक रूप से सिद्ध न किया हो।

अदालत ने पीड़िता के बयान का हवाला देते हुए कहा कि वह और आरोपी एक-दूसरे को जानते थे, उन्होंने मंदिर में शादी की थी, और करीब दो महीने तक साथ रहे, इस दौरान उनके बीच शारीरिक संबंध भी बने।

खंडपीठ ने कहा—

“इन तथ्यों से स्पष्ट है कि यह दो सहमत वयस्कों के बीच का संबंध था, जो अपराध नहीं है। अतः ट्रायल कोर्ट का निर्णय गंभीर त्रुटिपूर्ण है और उसे रद्द किया जाना आवश्यक है।”

अंततः हाईकोर्ट ने आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए दोषसिद्धि को रद्द कर दिया और विशेष न्यायाधीश तथा लोक अभियोजक को अपने आचरण पर स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया।

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